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bhagavat 12.13.23: मैं उस परम प्रभु, भगवान हरि को आदरपूर्वक प्रणाम करता हूँ, जिनके पवित्र नामों का समूहों में संगीतमय उच्चारण या कीर्तन करना समस्त पापों को नष्ट कर देता है और जिनको प्रणाम करने से समस्त भौतिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।   |   bhagavat अध्याय 12.13: श्रीमद्भागवत की महिमा   ।   bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 13: श्रीमद्भागवत की महिमा  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.13.23 
नामसङ्कीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम् ।
प्रणामो दु:खशमनस्तं नमामि हरिं परम् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
मैं उस परम प्रभु, भगवान हरि को आदरपूर्वक प्रणाम करता हूँ, जिनके पवित्र नामों का समूहों में संगीतमय उच्चारण या कीर्तन करना समस्त पापों को नष्ट कर देता है और जिनको प्रणाम करने से समस्त भौतिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।
 
I offer my respectful obeisances to Lord Hari, whose holy names, when chanted collectively, destroy all sins, and whose salutations give one relief from all material suffering.
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध बारह के अंतर्गत तेरहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)