द्विजऋषभ स एष ब्रह्मयोनि: स्वयंदृक्
स्वमहिमपरिपूर्णो मायया च स्वयैतत् ।
सृजति हरति पातीत्याख्ययानावृताक्षो
विवृत इव निरुक्तस्तत्परैरात्मलभ्य: ॥ २४ ॥
अनुवाद
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों, केवल वे ही स्वयंभू हैं, वेदों के मूल स्रोत हैं, जो अपनी ऐश्वर्यशाली शक्ति से पूर्ण और संपूर्ण हैं। वे अपनी भौतिक शक्ति से इस पूरे ब्रह्मांड का निर्माण, पालन और विनाश करते हैं। क्योंकि वे विभिन्न भौतिक कार्यों को करने वाले हैं, इसलिए उन्हें कभी-कभी भौतिक रूप से विभाजित बताया जाता है, फिर भी वे हमेशा शुद्ध ज्ञान में तल्लीन रहते हैं। जो लोग भक्ति में उनका समर्पण करते हैं वे उन्हें अपनी सच्ची आत्मा के रूप में महसूस कर सकते हैं।
O best of brahmanas, He alone is self-illuminated, the original source of the Vedas, perfect and complete in His glory. He creates, maintains and destroys this entire universe by His illusory power. Because He is the doer of various material activities, He is sometimes said to be divided, yet He remains situated in pure knowledge. Those who are engaged in His devotion can experience Him as their real Self.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने यह अनुशंसा की है कि हम निम्नलिखित ध्यान का अभ्यास करके विनम्र बनें: "पृथ्वी, जो हमेशा मेरे लिए दर्शनीय है, मेरे भगवान के चरणकमलों का विस्तार है, जिसका हमेशा ध्यान किया जाना चाहिए। सभी चल और अचल जीवों ने पृथ्वी का आश्रय लिया है और इस तरह मेरे भगवान के चरणकमलों पर आश्रय पाया है। इस कारण से मुझे हर जीव का सम्मान करना चाहिए और किसी से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। वास्तव में, सभी जीव मेरे प्रभु के सीने पर कौस्तुभ मणि का निर्माण करते हैं। इसलिए मुझे कभी भी किसी भी जीव से ईर्ष्या या उपहास नहीं करना चाहिए।" इस ध्यान का अभ्यास करने से व्यक्ति जीवन में सफलता प्राप्त कर सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥