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bhagavat 12.10.42: हे श्रेष्ठ भृगुवंशी, मार्कण्डेय ऋषि से जुड़ी यह गाथा भगवान की परम शक्ति का वर्णन करती है। जो कोई भी इसका सावधानीपूर्वक वर्णन करता है या इसे सुनता है, उसे दोबारा भौतिक अस्तित्व में नहीं आना पड़ेगा, जो कि केवल भोग-विलास की इच्छा पर आधारित है।   |   bhagavat अध्याय 12.10: शिव तथा उमा द्वारा मार्कण्डेय ऋषि का गुणगान   ।   bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 10: शिव तथा उमा द्वारा मार्कण्डेय ऋषि का गुणगान  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  12.10.42 
य एवमेतद् भृगुवर्य वर्णितं
रथाङ्गपाणेरनुभावभावितम् ।
संश्रावयेत् संश‍ृणुयादु तावुभौ
तयोर्न कर्माशयसंसृतिर्भवेत् ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
हे श्रेष्ठ भृगुवंशी, मार्कण्डेय ऋषि से जुड़ी यह गाथा भगवान की परम शक्ति का वर्णन करती है। जो कोई भी इसका सावधानीपूर्वक वर्णन करता है या इसे सुनता है, उसे दोबारा भौतिक अस्तित्व में नहीं आना पड़ेगा, जो कि केवल भोग-विलास की इच्छा पर आधारित है।
 
O best of the Bhrigu lineage, this description related by the sage Mārkaṇḍeya reveals the transcendental potency of the Lord. One who properly narrates it or hears it will not have to come again to the material world based on the desire to perform fruitive activities.
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध बारह के अंतर्गत दसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)