मन और हृदय के भीतर चेतना को नियंत्रित करने वाले सूक्ष्म नियमों के अनुसार इच्छा स्वयं प्रकट होती है। प्रभु की प्रेममयी सेवा में लगने की शुद्ध इच्छा व्यक्ति को चेतना के सर्वोच्च मंच पर ले जाती है, और जीवन की ऐसी पूर्ण समझ केवल प्रभु के भक्तों की विशेष दया से ही संभव है।
