Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 12.10.23: मात्र जल वाले स्थान तीर्थ नहीं होते, न ही देवताओं की निर्जीव मूर्तियाँ असली पूजनीय देवता। चूँकि बाहरी दृष्टि पवित्र नदियों और देवताओं के उच्च भाव को समझ नहीं पाती, इसलिए ये लंबे समय बाद ही पवित्र हो पाते हैं। लेकिन तुम जैसे भक्त, बस दिखने भर से, पवित्र कर देते हो। | bhagavat अध्याय 12.10: शिव तथा उमा द्वारा मार्कण्डेय ऋषि का गुणगान । bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवाश्चेतनोज्झिता: ।
ते पुनन्त्युरुकालेन यूयं दर्शनमात्रत: ॥ २३ ॥
अनुवाद
मात्र जल वाले स्थान तीर्थ नहीं होते, न ही देवताओं की निर्जीव मूर्तियाँ असली पूजनीय देवता। चूँकि बाहरी दृष्टि पवित्र नदियों और देवताओं के उच्च भाव को समझ नहीं पाती, इसलिए ये लंबे समय बाद ही पवित्र हो पाते हैं। लेकिन तुम जैसे भक्त, बस दिखने भर से, पवित्र कर देते हो।
Mere water bodies are not holy places, nor are lifeless idols of gods the true idols to be worshipped. Since the external vision cannot understand the lofty intentions of holy rivers and gods, they become pure only after a long time. But devotees like you purify by mere darshan.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥