श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 10: शिव तथा उमा द्वारा मार्कण्डेय ऋषि का गुणगान  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.10.16 
आह त्वात्मानुभावेन पूर्णकामस्य ते विभो ।
करवाम किमीशान येनेदं निर्वृतं जगत् ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय ने कहा: हे भगवन, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ, जो अपने ही आनंद में हमेशा संतुष्ट रहते हैं? निःसंदेह, आपकी कृपा से आप इस संसार को तृप्त करते हैं।
 
Mārkaṇḍeya said: O Vibhu, what can I do for You, who are always satisfied in Your own bliss? Indeed, You satisfy the entire universe by Your grace.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)