श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 1: कलियुग के पतित वंश  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.1.41 
तन्नाथास्ते जनपदास्तच्छीलाचारवादिन: ।
अन्योन्यतो राजभिश्च क्षयं यास्यन्ति पीडिता: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
इन नीच जाति के राजाओं के शासन में रहने वाली प्रजा अपने राजाओं के चरित्र, आचरण और बोलने के ढंग को अपना लेगी। अपने नेताओं और आपस में हाथापाई में वे सब बरबाद हो जाएंगे।
 
The people ruled by these low caste kings will imitate the character, conduct and speech of their rulers. They will be destroyed by being persecuted by their leaders and by each other.
तात्पर्य
श्रीमद्-भागवत के नौंवे काण्ड के अंत में यह कहा गया है कि इस अध्याय में उल्लिखित प्रथम राजा रिपुंजय, या पुरंजय ने भगवान कृष्ण के समय से लगभग एक हजार वर्ष बाद अपना शासन समाप्त किया। चूँकि भगवान कृष्ण लगभग पाँच हज़ार वर्ष पूर्व प्रकट हुए थे, इसलिए पुरंजय लगभग चार हज़ार वर्ष पूर्व प्रकट हुए होंगे। इसका मतलब यह हुआ कि उल्लिखित अंतिम राजा विश्वस्फूर्जी लगभग ईसाई युग की बारहवीं शताब्दी में प्रकट हुए होंगे।

आधुनिक पाश्चात्य विद्वानों ने यह झूठा आरोप लगाया है कि भारतीय धार्मिक साहित्य में कालक्रमानुसार इतिहास की कोई समझ नहीं है। लेकिन इस अध्याय में वर्णित विस्तृत ऐतिहासिक कालक्रम निश्चित रूप से उस भोले आंकलन का खंडन करता है।

 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध बारह के अंतर्गत पहला अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)