श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 9: पूर्ण वैराग्य  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  11.9.30 
एवं सञ्जातवैराग्यो विज्ञानालोक आत्मनि ।
विचरामि महीमेतां मुक्तसङ्गोऽनहङ्‍कृत: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
गुरुओं से प्राप्त शिक्षाओं से दीक्षित होकर, मैं सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान् की अनुभूति में सतत स्थित रहता हूँ। प्रबुद्ध आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश से आलोकित होकर, बिना किसी आसक्ति या मिथ्या अहंकार के स्वतन्त्र भाव से मैं पृथ्वी पर भ्रमण कर रहा हूँ।
 
Having received education from my preceptors, I remain situated in the realization of God, and in perfect detachment and enlightened by spiritual knowledge, I move freely on the earth, free from attachment or false ego.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)