जिह्वैकतोऽमुमपकर्षति कर्हि तर्षा
शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् ।
घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्ति-
र्बह्व्य: सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति ॥ २७ ॥
अनुवाद
जिस व्यक्ति की कई पत्नियाँ होती हैं, वह उनकी जिम्मेदारी के बोझ से लगातार परेशान रहता है। वह उनके पालन-पोषण के लिए उत्तरदायी होता है, और इस तरह सभी पत्नियाँ उसे अलग-अलग दिशाओं में खींचती हैं, हर पत्नी अपने स्वार्थ के लिए संघर्ष करती है। ठीक इसी तरह भौतिक इन्द्रियाँ भी बद्धजीव को एक साथ कई दिशाओं में खींचती हैं और उसे परेशान करती हैं। एक ओर जीभ उसे स्वादिष्ट भोजन की व्यवस्था करने के लिए खींचती हैं, तो दूसरी ओर प्यास उसे उपयुक्त पेय प्रदान करने के लिए घसीटती रहती है। उसी समय यौन-अंग अपनी तुष्टि के लिए शोर मचाते हैं और स्पर्शेन्द्रिय कोमल वासनामय पदार्थ की माँग रखती हैं। उदर उसे तब तक परेशान करता रहता है जब तक वह भर नहीं जाता। कान मनोहर ध्वनि सुनना चाहते हैं, घ्राणेन्द्रिय सुहावनी सुगँधियों के लिए लालायित रहती हैं और चंचल आँखें मनोहर दृश्य के लिए शोर मचाती हैं। इस तरह सभी इन्द्रियाँ और शरीर के अंग संतुष्टि के लिए अपनी इच्छाओं से जीव को लगातार कई दिशाओं में खींचते रहते हैं।
A person who has many wives is constantly harassed by them. He is responsible for their maintenance. Thus all the wives constantly pull him in different directions, and each wife struggles for her own selfish interests. In the same way the material senses pull and harass the conditioned soul in different directions simultaneously. On the one hand the tongue pulls to provide delicious food, while thirst drags him to provide suitable drink. At the same time the sexual organs clamour for their satisfaction and the sense of touch demands soft sensual objects. The stomach harasses him until it is full. The ears want to hear pleasant sounds, the sense of smell craves pleasant odors, and the restless eyes clamour for pleasant sights. In this way all the senses and the organs of the body pull the living entity in many directions with the desire for satisfaction.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर वर्णन करते हैं कि इस श्लोक को समझने के पश्चात् मनुष्य को मात्र आसक्ति रहित भाव से अपने शरीर के गुरु को आवश्यक ज़रूरतें ही अर्पित करनी चाहिए | मनुष्य को अपने शरीर को सरलतम संभव तरीके से कार्यशील और फिट रखना चाहिए, और इस तथाकथित गुरु की सेवा का यही सार है | यदि व्यक्ति शरीर की भक्ति ईमानदारी से करना चाहता है, तो उसे यह सोचना चाहिए, कि शरीर किसी भी स्थिति में आत्मा को अपनी ओर खींच लेता है, इस प्रकार शरीर के सेवक के लिए ईश्वर के स्वरूप को समझने या किसी भी प्रकार से शांति पाने की संभावना नहीं होती है |
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥