श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 9: पूर्ण वैराग्य  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  11.9.21 
यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णां सन्तत्य वक्त्रत: ।
तया विहृत्य भूयस्तां ग्रसत्येवं महेश्वर: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
जैसे मकड़ी अपने ही अंदर से मुंह से धागा निकालकर फैलाती है, कुछ समय तक उससे खेलती है और अंत में उसे निगल जाती है, उसी प्रकार भगवान अपनी निजी शक्ति को अपने अंदर से ही विस्तार देते हैं। इस तरह भगवान विराट जगत रूपी जाल को प्रदर्शित करते हैं, अपने प्रयोजन के अनुसार उसे काम में लाते हैं और अंत में उसे पूरी तरह से अपने अंदर समेट लेते हैं।
 
Just as a spider stretches out a thread from within itself (from its mouth), plays with it for some time and finally swallows it, similarly God expands His personal energy from within Himself. In this way, God manifests the vast web of the universe, uses it according to His purpose and finally gathers it completely within Himself.
तात्पर्य
जो बुद्धिमान होता है, उसे मकड़ी जैसे नगण्य जीव से भी आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो जाता है। इसलिए, जो कॄष्ण की भक्ति में पूर्णतः निमग्न है, उसके लिए अलौकिक ज्ञान हर स्थान पर दिखायी देता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)