भोजन के लिए साधु-महात्मा संत को इतना ही ग्रहण करना चाहिए जिससे उनके शरीर और जीव का यापन हो सके। उन्हें थोड़ा-थोड़ा भोजन प्रत्येक परिवार से द्वार-द्वार जाकर ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार मधुमक्खी की वृत्ति का उन्हें पालन करना चाहिए।
A saint should accept only as much food as is sufficient to sustain his life. He should go from door to door and accept a little food from each family. In this way he should practice the behavior of a bee.
तात्पर्य
कभी-कभी किसी विशिष्ट कमल के पुष्प की असाधारण सुगंध किसी मधुमक्खी को आकर्षित कर लेती है और वह मधुमक्खी फूल से फूल जाने की अपनी सामान्य क्रिया को उपेक्षित करते हुए वहीं रुक जाती है। दुर्भाग्य से, सूर्यास्त के समय कमल का फूल बंद हो जाता है, और इस प्रकार आसक्त मधुमक्खी फंस जाती है। इसी प्रकार, किसी सन्यासी या ब्रह्मचारी को यह पता चल सकता है कि किसी विशेष घर में उत्तम खाद्य पदार्थ उपलब्ध है, और इसलिए, एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करने के बजाय, वह ऐसे सुसंगठित घर का सच्चा निवासी बन सकता है। इस प्रकार, वह गृहस्थ जीवन के भ्रम से भ्रमित हो जाएगा और त्याग के मंच से गिर जाएगा। इसके अलावा, यदि कोई भिक्षुक दान के वैदिक रिवाज़ का अनुचित लाभ उठाता है और एक ही परिवार से अक्सर लेता है, तो उससे होने वाला आक्रोश सामाजिक व्यवस्था को भंग कर देगा। एक आदर्श संत को मधुमक्खी की तरह एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करनी चाहिए, लेकिन उसे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह बहुत से घरों में जाकर भव्य भोज खाने वाला मोटा भँवरा न बन जाए। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के अनुसार, ऐसा मोटा भँवरा निःसंदेह माया के जाल में फँस जाएगा। किसी को भी अपनी जीभ की संतुष्टि से अधिक जुड़ाव नहीं रखना चाहिए, क्योंकि इससे पेट भरा रहेगा और फिर अदम्य वासना। निष्कर्ष रूप में, भौतिक संतुष्टि के लिए बहुत प्रयास नहीं करना चाहिए, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर, कृष्ण की महिमा का प्रसार करने के लिए कठोर प्रयास करना चाहिए। यही मानवीय ऊर्जा का उचित उपयोग है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥