समृद्धकामोहीनो वा नारायणपरो मुनि: ।
नोत्सर्पेत न शुष्येत सरिद्भिरिव सागर: ॥ ६ ॥
अनुवाद
वर्षा ऋतु में उफनती हुई नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं और गर्मी के मौसम में उथली हो जाने पर उनमें पानी की मात्रा बहुत कम हो जाती है। लेकिन समुद्र न तो वर्षा ऋतु में बढ़ता है और न ही गर्मी के मौसम में सूखता है। उसी तरह जिस संत-भक्त ने भगवान को अपने जीवन का लक्ष्य मान लिया है उसे कभी-कभी भाग्य से बहुत ज़्यादा भौतिक संपत्ति मिल जाती है और कभी-कभी वह खुद को भौतिक दृष्टि से कंगाल पाता है। लेकिन भगवान का ऐसा भक्त न तो अपने सुनहरे दिनों में खुश होता है और न ही गरीबी में दुखी होता है।
In the rainy season, the overflowing rivers merge into the sea and in the summer season, due to becoming shallow, the quantity of water in them decreases considerably. Yet the sea neither swells in the rainy season, nor dries up in the summer season. Similarly, the saint-devotee who has accepted God as the goal of his life, sometimes gets abundant material wealth by fate and sometimes finds himself poor from the material point of view. Still, such a devotee of God neither gets happy at the time of promotion, nor gets sad on becoming poor.
तात्पर्य
भगवान का एक सच्चा भक्त हमेशा भगवान से मिलने और उन्हें पारलौकिक सेवा देने के लिए उत्सुक रहता है। वह भगवान के चरणकमलों में एक परमाणु की तरह स्थिर रहना चाहता है क्योंकि भगवान कृष्ण, या नारायण, सभी सुखों के भंडार हैं। जब वह शुद्ध कृष्ण चेतना का अनुभव करता है तो वह आनन्दित होता है और जब कृष्ण उसके मन में नहीं होते हैं तो वह उदास रहता है। भौतिक दुनिया के साथ अपने व्यवहार में, एक भक्त साधारण, भौतिकवादी लोगों से परेशान नहीं हो सकता है जो कभी-कभी उसका अपमान करते हैं और उस पर भौतिक इंद्रियों की तृप्ति की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हैं, जैसे महासागर में प्रवेश करने वाली असंख्य नदियों से महासागर परेशान नहीं हो सकता। कभी-कभी कामुक महिलाएं एक शुद्ध भक्त के पास आती हैं, और कभी-कभी सट्टा लगाने वाले दार्शनिक भगवान के व्यक्तित्व के खिलाफ बहस करने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसे सभी सामान्य लोगों के साथ, एक शुद्ध भक्त अपनी आनंदित कृष्ण चेतना में अनासक्त और अविचलित रहता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥