मुनि अपने बाहरी व्यवहार में सुखी और प्रसन्नचित्त होता है, जबकि भीतर से वह अति गंभीर और विचारशील होता है। क्योंकि उसका ज्ञान अपार और असीम होता है, इसलिए वह कभी परेशान नहीं होता। इस प्रकार वह हर तरह से गहरे और अथाह सागर के शांत जल जैसा होता है।
A sage is pleasant and sweet in his outward behaviour, but is extremely serious and thoughtful from within. Since his knowledge is unfathomable and infinite, he is never agitated. In this way he is like the calm water of an unfathomable and impassable ocean in every way.
तात्पर्य
भयंकर विपत्तियों के घेरों मे भी आत्म-साक्षात्कारी ऋषि स्वयं का संतुलन नहीं खोते हैं, ना ही उनका आध्यात्मिक ज्ञान खोता है। इसलिए वे अक्षोभ्य हैं, या अविचलित हैं। उनका मन सर्वोच्च ईश्वर-व्यक्तित्व पर स्थिर रहता है, जो असीम आध्यात्मिक आनंद का भंडार है, और अपनी चेतना को सर्वोच्च चेतना से जोड़ने पर, उनके ज्ञान को मापा नहीं जा सकता है। एक शुद्ध भक्त, प्रभु के चरण-कमलों की शरण लेते हुए, असीम आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करता है, और इसलिए वह अपराजेय है। वास्तव में, अपने आध्यात्मिक शरीर का विकास करके, वह समय के बिगड़े हुए कार्यों से प्रभावित नहीं होता है। यद्यपि बाहरी रूप से वह सभी के प्रति मित्रवत और प्रिय है, परंतु आंतरिक रूप से उसका मन परम सत्य में स्थिर है और कोई भी उसके वास्तविक उद्देश्य या योजना को समझ नहीं सकता है। यहां तक कि सबसे बुद्धिमान मनुष्य भी एक आत्म-साक्षात्कारी भक्त की मानसिक गतिविधियों को समझ नहीं सकते हैं, जिसने वासना और लालच पर आधारित भौतिक जीवन को त्याग दिया है और प्रभु के चरणकमलों की शरण ले ली है। ऐसी महान आत्मा की तुलना विशाल महासागर से की जा सकती है। असंख्य शक्तिशाली नदियाँ महासागर में प्रवेश करती हैं, लेकिन महासागर शांत और शांतिपूर्ण बना रहता है। इस प्रकार, एक संत व्यक्ति को महासागर की तरह, सुखद, अथाह, गंभीर, अपराजेय, असीमित और अडिग समझा जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥