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bhagavat 11.8.44: निःसंदेह भौतिक इच्छाएँ ही सबसे ज्यादा दुःखों की वजह बनती हैं और ऐसी इच्छाओं से मुक्ति मिलना ही सबसे बड़ी खुशी है। इसलिए तथाकथित प्रेमियों के साथ विहार करने की अपनी इच्छा को पूरी तरह से त्यागकर पिंगला बहुत खुश होकर सो गई।   |   bhagavat अध्याय 11.8: पिंगला की कथा   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 8: पिंगला की कथा  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  11.8.44 
आशा हि परमं दु:खं नैराश्यं परमं सुखम् ।
यथा सञ्छिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिङ्गला ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
निःसंदेह भौतिक इच्छाएँ ही सबसे ज्यादा दुःखों की वजह बनती हैं और ऐसी इच्छाओं से मुक्ति मिलना ही सबसे बड़ी खुशी है। इसलिए तथाकथित प्रेमियों के साथ विहार करने की अपनी इच्छा को पूरी तरह से त्यागकर पिंगला बहुत खुश होकर सो गई।
 
Undoubtedly, material desire is the cause of the greatest misery and freedom from such desire is the cause of the greatest happiness. Therefore, having completely given up her desire to frolic with the so-called lovers, Pingla went to sleep peacefully.
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध ग्यारह के अंतर्गत आठवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)