श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 8: पिंगला की कथा  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  11.8.42 
आत्मैव ह्यात्मनो गोप्ता निर्विद्येत यदाखिलात् ।
अप्रमत्त इदं पश्येद् ग्रस्तं कालाहिना जगत् ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
जब जीव देखता है कि पूरे ब्रह्मांड को समय के नाग ने पकड़ लिया है, तो वह शांत और समझदार हो जाता है और फिर वह अपने आप को सभी भौतिक इंद्रिय सुखों से दूर कर लेता है। ऐसी स्थिति में जीव अपने आप को बचाने के योग्य हो जाता है।
 
When a living being sees that the entire universe has been caught by the serpent of time, he becomes serious and prudent and then he detaches himself from all material sense-gratification. In that state, the living being becomes eligible to become his own protector.
तात्पर्य
इस पद्‌य में, पिंलगा बताती हैं कि भगवान की कृपा से एक आत्म-साक्षात्कारी आत्मा देख सकती है कि पूरा ब्रह्मांड समय के विशाल सर्प के जबड़ों में समाया हुआ है। निश्चित रूप से यह एक आशाजनक स्थिति नहीं है और जो इसे देखता है वह इंद्रिय तृप्ति की अपनी इच्छा खो देता है। इस प्रकार, भगवान की अकारण दया से, आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ जीव स्वयं को भ्रम से बचा सकता है।

चूंकि पिंलगा अब मोक्ष प्रदान करने के लिए भगवान की दया का गुणगान कर रही है, इसलिए निम्नलिखित प्रश्न उठ सकता है: क्या वह प्रेम से भगवान की पूजा कर रही है, या वह केवल एक मुक्तिवादी है जो भौतिक अस्तित्व से मुक्ति की इच्छा रखती है? उत्तर में यह कहा जा सकता है कि कृष्ण-भावनामात्र स्थिति में वह पहले से ही मुक्त है, भले ही इस दुनिया में रह रही हो। अब उसका कार्य केवल भगवान की व्यक्तित्व स्वरूप के प्रति बिना किसी व्यक्तिगत इच्छा के, जिसमें मुक्ति की इच्छा भी शामिल है, प्रेमपूर्ण सेवा करना होगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)