श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 8: पिंगला की कथा  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  11.8.41 
संसारकूपे पतितं विषयैर्मुषितेक्षणम् ।
ग्रस्तं कालाहिनात्मानं कोऽन्यस्त्रातुमधीश्वर: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
भोग-विलास के कामों में डूब जाने से जीव की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और तब वह संसार के घोर अंधकार में डूब जाता है। वहाँ समय रूपी महाभयंकर सर्प उसे जकड़ लेता है। ऐसे निराशाजनक हालातों से भगवान के सिवा उसे और कौन बचा सकता है?
 
The living entity's intelligence is taken away by the activities of sense-gratification and then he falls into the dark well of the material world. Then in this well he is caught by the terrible serpent of death. Who else but God can save the poor living entity from such a hopeless state?
तात्पर्य
पिङ्गला ने पिछले श्लोक में कहा है कि देवता भी एक स्त्री को वास्तविक खुशी नहीं दे सकते। कोई सवाल कर सकता है कि इस महिला को ब्रह्मा, शिव और अन्य देवता जैसे ऊँचे व्यक्तित्वों को भी अस्वीकार करने का अधिकार किसने दिया है। यहाँ दिया गया जवाब यह है कि अगर कोई वास्तव में जीवन की सभी समस्याओं को हल करना चाहता है और घर वापस जाना चाहता है, भगवान के पास वापस जाना चाहता है, तो इसका एकमात्र समाधान भगवान के चरण कमलों की शरण लेना है। यह अच्छी तरह से जाना जाता है कि देवता स्वयं जन्म और मृत्यु के अधीन हैं। जैसा कि स्वयं भगवान शिव ने कहा है, मुक्ति-प्रदाता सर्वेषां विष्णुर एव न संशयः: "इसमें कोई संदेह नहीं है कि विष्णु ही सभी के लिए मुक्ति के प्रदाता हैं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)