श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 8: पिंगला की कथा  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  11.8.4 
ओज:सहोबलयुतं बिभ्रद् देहमकर्मकम् ।
शयानो वीतनिद्रश्च नेहेतेन्द्रियवानपि ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
संतो को शांत और भौतिक तौर पर निष्क्रिय रहना चाहिए, अधिक प्रयास किए बिना अपने शरीर की देखभाल करनी चाहिए। काम, मन और शरीर की पूरी शक्ति रखने के बावजूद संत को भौतिक लाभ के लिए सक्रिय नहीं होना चाहिए, बल्कि अपने असली स्वार्थ के लिए हमेशा सतर्क रहना चाहिए।
 
A saint should remain calm and physically inactive. He should maintain his body without much effort. Even though he is endowed with full sexual, mental and physical strength, a saint should not be active for material gain, but should always be alert for his real self-interest.
तात्पर्य
इस श्लोक में प्रयुक्त शब्द विट-निद्रः बहुत महत्वपूर्ण है। निद्रा का अर्थ "नींद" या "अज्ञानता" होता है, और विट का अर्थ "मुक्त" है। दूसरे शब्दों में, एक पारलौकिकवादी को सर्वोच्च भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंधों के प्रति सदा जागृत रहना चाहिए और कृष्ण चेतना का सावधानीपूर्वक संवर्धन करना चाहिए। भगवान के अपने साथ संबंध के प्रति आश्वस्त होने पर, उन्हें अपने व्यक्तिगत रखरखाव के लिए प्रयास नहीं करना चाहिए, यह जानकर कि भगवान सभी मामलों में उनकी रक्षा कर रहे हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि अजगर का उदाहरण इसलिए दिया गया है ताकि कोई भी व्यक्ति अपने समय को निरर्थक रूप से शारीरिक रखरखाव में बर्बाद न करे।

हालाँकि, किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि जीवन का उद्देश्य अजगर की तरह जमीन पर लेटना या तन को भूखा रखने का दिखावा करना है। अजगर के उदाहरण को किसी को भी पूरी तरह से निष्क्रिय होने के लिए प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। बल्कि व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति में सक्रिय और भौतिक इंद्रिय तृप्ति में निष्क्रिय हो जाना चाहिए। यदि कोई पूरी तरह से निष्क्रिय हो जाता है, तो वह निश्चित रूप से निद्रा, या अज्ञानता का अंधकार है, जिसमें व्यक्ति भगवान के एक शाश्वत सेवक के रूप में अपनी पहचान के लिए सोया रहता है।

एक पारलौकिकवादी भगवान की अपनी सेवा करने के लिए उत्सुक है, और इसलिए वह आभारी होता है जब भगवान ऐसी सेवा के लिए भौतिक सुविधाएं प्रदान करते हैं। भौतिक दुनिया का केवल त्याग फाल्गु-वैराग्य है, या आध्यात्मिक समझ का एक अपरिपक्व चरण है। व्यक्ति को युक्त-वैराग्य के स्तर पर आना होगा, जो प्रत्येक वस्तु को भगवान कृष्ण की सेवा में लगाता है। यह हमारा व्यावहारिक अनुभव है कि कृष्ण चेतना फैलाने में तल्लीन एक भक्त को अपने व्यक्तिगत रखरखाव के लिए सभी सुविधाएँ स्वचालित रूप से प्राप्त होती हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)