हालाँकि, किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि जीवन का उद्देश्य अजगर की तरह जमीन पर लेटना या तन को भूखा रखने का दिखावा करना है। अजगर के उदाहरण को किसी को भी पूरी तरह से निष्क्रिय होने के लिए प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। बल्कि व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति में सक्रिय और भौतिक इंद्रिय तृप्ति में निष्क्रिय हो जाना चाहिए। यदि कोई पूरी तरह से निष्क्रिय हो जाता है, तो वह निश्चित रूप से निद्रा, या अज्ञानता का अंधकार है, जिसमें व्यक्ति भगवान के एक शाश्वत सेवक के रूप में अपनी पहचान के लिए सोया रहता है।
एक पारलौकिकवादी भगवान की अपनी सेवा करने के लिए उत्सुक है, और इसलिए वह आभारी होता है जब भगवान ऐसी सेवा के लिए भौतिक सुविधाएं प्रदान करते हैं। भौतिक दुनिया का केवल त्याग फाल्गु-वैराग्य है, या आध्यात्मिक समझ का एक अपरिपक्व चरण है। व्यक्ति को युक्त-वैराग्य के स्तर पर आना होगा, जो प्रत्येक वस्तु को भगवान कृष्ण की सेवा में लगाता है। यह हमारा व्यावहारिक अनुभव है कि कृष्ण चेतना फैलाने में तल्लीन एक भक्त को अपने व्यक्तिगत रखरखाव के लिए सभी सुविधाएँ स्वचालित रूप से प्राप्त होती हैं।
