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bhagavat 11.8.38: जिस व्यक्ति में वैराग्य की भावना विकसित हो गई है, वह भौतिक समाज, मित्रता और प्रेम के बंधनों को त्याग सकता है और जो व्यक्ति बहुत अधिक कष्टों से गुजरता है, वह धीरे-धीरे निराशा के कारण भौतिक संसार से विमुख हो जाता है। इसी तरह, मेरे अत्यधिक कष्टों के चलते मेरे हृदय में ऐसी वैराग्यता जाग गई है; लेकिन अगर मैं वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण होती, तो मुझे ऐसे दयालु कष्ट क्यों भुगतने पड़ते? इसलिए, मैं वास्तव में भाग्यशाली हूँ और मुझे भगवान की कृपा प्राप्त हुई है। वे निश्चित रूप से मुझ पर प्रसन्न हैं।   |   bhagavat अध्याय 11.8: पिंगला की कथा   ।   bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 8: पिंगला की कथा  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  11.8.38 
मैवं स्युर्मन्दभाग्याया: क्लेशा निर्वेदहेतव: ।
येनानुबन्धं निर्हृत्य पुरुष: शममृच्छति ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
जिस व्यक्ति में वैराग्य की भावना विकसित हो गई है, वह भौतिक समाज, मित्रता और प्रेम के बंधनों को त्याग सकता है और जो व्यक्ति बहुत अधिक कष्टों से गुजरता है, वह धीरे-धीरे निराशा के कारण भौतिक संसार से विमुख हो जाता है। इसी तरह, मेरे अत्यधिक कष्टों के चलते मेरे हृदय में ऐसी वैराग्यता जाग गई है; लेकिन अगर मैं वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण होती, तो मुझे ऐसे दयालु कष्ट क्यों भुगतने पड़ते? इसलिए, मैं वास्तव में भाग्यशाली हूँ और मुझे भगवान की कृपा प्राप्त हुई है। वे निश्चित रूप से मुझ पर प्रसन्न हैं।
 
A person who has developed detachment can give up the bonds of material society, friendship and love, and a man who suffers great suffering gradually becomes detached out of despair and becomes indifferent to the material world. It is because of my great suffering that such detachment has arisen in my heart; otherwise, if I were really unfortunate, why should I have to undergo such pitiable suffering? Therefore, I am really fortunate and have received the mercy of the Lord. He is certainly pleased with me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)