श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 8: पिंगला की कथा  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  11.8.33 
यदस्थिभिर्निर्मितवंशवंश्य-
स्थूणं त्वचा रोमनखै: पिनद्धम् ।
क्षरन्नवद्वारमगारमेतद्
विण्मूत्रपूर्णं मदुपैति कान्या ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
यह भौतिक शरीर एक घर के सदृश है, जिसमें मैं, आत्मा रूप में निवास कर रही हूँ। मेरी रीढ़, पसलियों, हाथ तथा पाँव को बनाने वाली हड्डियाँ इस घर की आड़ी-तिरछी लकड़ियाँ, खंभे और आधार हैं। पूरा ढाँचा मल-मूत्र से भरा हुआ है, जिसे चमड़ी, बाल और नाखून ढँके हुए हैं। इस शरीर में जाने के नौ द्वार लगातार गंदी वस्तुओं को निकालते रहते हैं। मेरे अलावा, कौन महिला इतनी मूर्ख होगी जो इस भौतिक शरीर के प्रति इतनी आसक्त हो जाए कि वह सोचे कि उसे इस यंत्र से आनंद और प्रेम मिल सकता है?
 
This physical body is like a house in which I live as a soul. The bones forming my spine, ribs, arms and legs are the horizontal and horizontal beams, splinters and pillars of this house and the whole structure is filled with excreta and urine and covered with skin, hair and nails. The nine doors leading into this body are constantly excreting dirty things. What woman besides me would be so foolish as to be attached to this physical body thinking that she can get happiness and love by this device?
तात्पर्य
शरीर में प्रवेश करने और बाहर निकलने के नौ द्वार दो आँख, दो नथुने, मुँह, दो कान, जननांग और गुदा हैं। वंश या "रीढ़" का अर्थ "बांस" भी होता है, और वास्तव में कंकाल एक बांस के ढांचे जैसा दिखाई देता है। जिस प्रकार बांस को तुरंत राख में जलाया जा सकता है या टुकड़ों में काटा जा सकता है, उसी प्रकार भौतिक शरीर, जो लगातार बिगड़ रहा है, किसी भी क्षण चकनाचूर हो सकता है, टुकड़ों में काटा जा सकता है, डूब सकता है, जल सकता है, घुट सकता है, आदि। अंततः शरीर का विघटन होना ही है, और इसलिए निश्चित रूप से ऐसा कोई नहीं है जो इस नाजुक शरीर के लिए अपने दिल और आत्मा को समर्पित करने में दुर्भाग्यपूर्ण है, जो अप्रिय तत्वों से भरा हुआ है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)