श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 8: पिंगला की कथा  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  11.8.30 
पिङ्गलोवाच
अहो मे मोहविततिं पश्यताविजितात्मन: ।
या कान्तादसत: कामं कामये येन बालिशा ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
देखो, मैं कितनी मोहित हूँ। क्योंकि मैं अपने चित्त को वश में नहीं कर पाती, इसलिए एक मूर्ख की तरह तुच्छ पुरुष से ही विषय-सुख की इच्छा करती हूँ।
 
Pingla prostitute said: Just look how enamoured I am. Since I cannot control my mind, I am foolishly seeking sensual pleasure from some worthless person.
तात्पर्य
भौतिक अस्तित्व में सभी इंद्रियाँ विभिन्न वस्तुओं की ओर आकर्षित होती हैं, और इस प्रकार सशर्त आत्मा प्रथम श्रेणी का मूर्ख बन जाती है। भौतिक जीवन का कारण परम सत्य के प्रति उदासीनता है। सशर्त आत्मा स्वयं को भौतिक जगत का स्वामी और भोग विलास करने वाला समझती है और जीवन का उद्देश्य इन्द्रियों को संतुष्ट करना मानती है। जितना अधिक कोई भौतिक दुनिया का भोग करने की कोशिश करता है, उतना ही उसका भ्रम बढ़ता जाता है।

इस पद से ऐसा प्रतीत होता है कि वेश्या पिंगला न केवल वेश्यावृत्ति के माध्यम से अपनी आजीविका कमा रही थी, बल्कि वास्तव में अनगिनत पुरुषों के साथ अपने अवैध संपर्क का आनंद ले रही थी। कांटाद असत: शब्द यह दर्शाते हैं कि वह सबसे साधारण और बेकार पुरुषों को "प्रेमियों" मानते हुए, बिना किसी भेदभाव के स्वतंत्र रूप से स्वयं को बेच रही थी। इसलिए वह कहती है, "मैं एक बड़ी मूर्ख थी।" बालिशा शब्द का अर्थ है "वह जिसकी बचकानी मानसिकता है, बिना सही और गलत का व्यावहारिक अनुभव के।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)