श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 8: पिंगला की कथा  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  11.8.27 
तस्या वित्ताशया शुष्यद्वक्त्राया दीनचेतस: ।
निर्वेद: परमो जज्ञे चिन्ताहेतु: सुखावह: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
रात बढ़ती गई, तो वेश्या, जिसे धन की अत्यधिक इच्छा थी, वह धीरे-धीरे निराश हो उठी और उसके चेहरे पर मुरझापन छा गया। इस प्रकार धन की चिंता और गहरी निराशा से घिरकर वह अपनी स्थिति से अत्यधिक विमुख होने लगी और धीरे-धीरे उसके मन में सुख का उदय हुआ।
 
As the night passed, the prostitute, who was very desirous of money, gradually became despondent and her face became pale. Thus filled with the anxiety of money and being very despondent, she began to feel very detached from her situation and happiness arose in her mind.
तात्पर्य
इन छंदों से यह स्पष्ट होता है कि उस विशेष रात को वेश्या पिङ्गला अपने घर पर ग्राहकों को आकर्षित करने में बिल्कुल भी सफल नहीं हुई। पूरी तरह से निराश और हताश होकर, वह धीरे-धीरे अपनी स्थिति के प्रति उदासीन हो गई। इस प्रकार, महान पीड़ा कभी-कभी व्यक्ति को ज्ञान के मार्ग पर ले जाती है; या, एक संस्कृत कहावत के अनुसार, निराशा से सबसे बड़ी संतुष्टि मिलती है।

वेश्या ने अपना जीवन अनेक पुरुषों की वासना की इच्छाओं को पूरा करने के लिए समर्पित कर दिया था। अपने मन, शरीर और शब्दों को कामुक प्रेमियों की सेवा में लगाते हुए, वह भगवान के भक्तिमय सेवा को पूरी तरह से भूल गई, और इस प्रकार उसका मन अत्यंत अस्थिर और विचलित था। अंततः, पूरी तरह से निराश होकर, उसका चेहरा और गला सूख गया, वह अपनी स्थिति के प्रति उदासीन महसूस करने लगी, और उसके मन में खुशी का उदय हुआ।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)