श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 8: पिंगला की कथा  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  11.8.21 
तावज्जितेन्द्रियो न स्याद् विजितान्येन्द्रिय: पुमान् ।
न जयेद् रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
भले ही इंसान सभी अन्य इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ले, लेकिन जब तक वह अपनी जीभ पर काबू नहीं कर लेता, तब तक वह इंद्रिय-विजेता नहीं कहलाता। किंतु यदि कोई व्यक्ति अपनी जीभ को वश में करने में सक्षम हो जाता है, तो वह सभी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाला माना जाता है।
 
Even if a person conquers all the other senses, until he conquers the tongue, he is not called a conqueror of senses. But if a person is able to control the tongue, then he is considered to have complete control over all the senses.
तात्पर्य
भोजन ग्रहण करने से व्यक्ति इन्द्रियों को ऊर्जा और सक्रियता देता है, और इसलिए यदि जीभ अनियंत्रित होती है तो सभी इन्द्रियों को अस्तित्व के भौतिक मंच की ओर खींच लिया जाएगा। इसलिए हर तरह से व्यक्ति को जीभ को नियंत्रित करना चाहिए। यदि कोई उपवास करता है तो अन्य सभी इन्द्रियां कमजोर हो जाती हैं और अपनी क्षमता खो देती हैं। हालाँकि, स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद चखने के लिए जीभ अधिक लालची हो जाती है, और जब कोई अंततः जीभ की इच्छापूर्ति करता है, तो सभी इन्द्रियाँ शीघ्र ही नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं। इसलिए, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर सलाह देते हैं कि व्यक्ति महा-प्रसाद, या भगवान के भोजन के अवशेषों को कम मात्रा में ग्रहण करे। चूँकि जीभ का कार्य भी कंपन करना है, इसलिए व्यक्ति को सर्वोच्च भगवान के गौरवपूर्ण पवित्र नाम का उच्चारण करना चाहिए और कृष्ण भावना के शुद्ध आनंद का स्वाद लेना चाहिए। जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, रस-वर्जम रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते: केवल कृष्ण भावना के उच्चतर स्वाद से ही व्यक्ति उस घातक निम्न स्वाद को छोड़ सकता है जो उसे भौतिक बंधन में कैद रखता है।

श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि जब तक किसी की बुद्धि भौतिक रूप से ढकी होती है, तब तक वह कृष्ण भावना के आनंद को समझ नहीं सकता है। कृष्ण के बिना आनंद लेने की कोशिश करते हुए जीव व्रजभूमि नामक सर्वोच्च भगवान के निवास को छोड़कर भौतिक दुनिया में आ जाता है, जहाँ वह शीघ्र ही अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण खो देता है। व्यक्ति विशेष रूप से जीभ, पेट और जननांगों द्वारा शिकार बन जाता है, जो बाध्य आत्मा पर असहनीय दबाव डालते हैं। हालाँकि, ये इच्छाएँ तब कम हो जाती हैं जब व्यक्ति भगवान के साथ अपने आनंदमय संबंध को पुनः स्थापित करता है, जो वास्तव में सभी आनंदों का भंडार है। जो व्यक्ति कृष्ण भावना के स्वाद से जुड़ा होता है, वह स्वचालित रूप से धार्मिक जीवन के सभी नियमों और विनियमों का पालन करता है, जिसमें विशुद्ध-सत्व, या शुद्ध अच्छाई का मोड, शामिल होता है। ऐसे सहज आकर्षण के बिना, व्यक्ति निश्चित रूप से भौतिक इन्द्रियों के धकेलने से चकित होता है।

भक्ति सेवा का प्रारंभिक चरण, जिसे साधना-भक्ति (विनियामक अभ्यास) कहा जाता है, इतना शक्तिशाली है कि यह व्यक्ति को अनर्थ-निवृत्ति के मंच पर ले जाता है, जहाँ वह अवांछित पापपूर्ण आदतों से मुक्त हो जाता है और जीभ, पेट और जननांगों के दबाव से राहत प्राप्त करता है। इस प्रकार व्यक्ति को भौतिक व्यसन के बंधन से मुक्ति मिल जाती है और वह अब भौतिक ऊर्जा के आकर्षण से धोखा नहीं खा सकता है। जैसा कि कहा जाता है, जो कुछ चमकता है वो सोना नहीं होता। इस संबंध में श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर अनुशंसा करते हैं कि हम उनके पिता, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा लिखे गए निम्नलिखित गीत पर विचार करें:

शरीर अविद्या-जाल, जड़ेन्द्रिय ताहे काल,

जीवे फेले विषय-सागरे

ता’र माध्ये जिह्वा अति, लोभमय सुदुरमति,

ता’के जेता कठिन संसारे

कृष्ण बड़ा दयामय, करिबारे जिह्वा जय,

स्व-प्रसादान्न दिला भाई

सेई अन्नामृत पाओ, राधा-कृष्ण-गुण गाओ,

प्रेमे डाको चैतन्य-नीताई

"हे भगवान, यह भौतिक शरीर अज्ञानता का एक ढेर है, और इन्द्रियाँ मृत्यु के रास्तों का एक नेटवर्क हैं। किसी तरह हम भौतिक इंद्रिय भोग के इस सागर में गिर गए हैं, और सभी इन्द्रियों में जीभ सबसे अधिक प्रचंड और बेकाबू है; इस दुनिया में जीभ को जीतना बहुत मुश्किल है। लेकिन आप, प्रिय कृष्ण, हमारे प्रति बहुत दयालु हैं और जीभ को नियंत्रित करने के लिए हमें इतना अच्छा प्रसाद दिया है। अब हम यह प्रसाद पूरी तरह से अपनी संतुष्टि के लिए लेते हैं और उनके प्रभु श्री श्री राधा-कृष्ण की महिमा करते हैं, और प्रेम में भगवान चैतन्य और भगवान नित्यानंद की मदद के लिए आह्वान करते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)