श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि जब तक किसी की बुद्धि भौतिक रूप से ढकी होती है, तब तक वह कृष्ण भावना के आनंद को समझ नहीं सकता है। कृष्ण के बिना आनंद लेने की कोशिश करते हुए जीव व्रजभूमि नामक सर्वोच्च भगवान के निवास को छोड़कर भौतिक दुनिया में आ जाता है, जहाँ वह शीघ्र ही अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण खो देता है। व्यक्ति विशेष रूप से जीभ, पेट और जननांगों द्वारा शिकार बन जाता है, जो बाध्य आत्मा पर असहनीय दबाव डालते हैं। हालाँकि, ये इच्छाएँ तब कम हो जाती हैं जब व्यक्ति भगवान के साथ अपने आनंदमय संबंध को पुनः स्थापित करता है, जो वास्तव में सभी आनंदों का भंडार है। जो व्यक्ति कृष्ण भावना के स्वाद से जुड़ा होता है, वह स्वचालित रूप से धार्मिक जीवन के सभी नियमों और विनियमों का पालन करता है, जिसमें विशुद्ध-सत्व, या शुद्ध अच्छाई का मोड, शामिल होता है। ऐसे सहज आकर्षण के बिना, व्यक्ति निश्चित रूप से भौतिक इन्द्रियों के धकेलने से चकित होता है।
भक्ति सेवा का प्रारंभिक चरण, जिसे साधना-भक्ति (विनियामक अभ्यास) कहा जाता है, इतना शक्तिशाली है कि यह व्यक्ति को अनर्थ-निवृत्ति के मंच पर ले जाता है, जहाँ वह अवांछित पापपूर्ण आदतों से मुक्त हो जाता है और जीभ, पेट और जननांगों के दबाव से राहत प्राप्त करता है। इस प्रकार व्यक्ति को भौतिक व्यसन के बंधन से मुक्ति मिल जाती है और वह अब भौतिक ऊर्जा के आकर्षण से धोखा नहीं खा सकता है। जैसा कि कहा जाता है, जो कुछ चमकता है वो सोना नहीं होता। इस संबंध में श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर अनुशंसा करते हैं कि हम उनके पिता, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा लिखे गए निम्नलिखित गीत पर विचार करें:
शरीर अविद्या-जाल, जड़ेन्द्रिय ताहे काल,
जीवे फेले विषय-सागरे
ता’र माध्ये जिह्वा अति, लोभमय सुदुरमति,
ता’के जेता कठिन संसारे
कृष्ण बड़ा दयामय, करिबारे जिह्वा जय,
स्व-प्रसादान्न दिला भाई
सेई अन्नामृत पाओ, राधा-कृष्ण-गुण गाओ,
प्रेमे डाको चैतन्य-नीताई
"हे भगवान, यह भौतिक शरीर अज्ञानता का एक ढेर है, और इन्द्रियाँ मृत्यु के रास्तों का एक नेटवर्क हैं। किसी तरह हम भौतिक इंद्रिय भोग के इस सागर में गिर गए हैं, और सभी इन्द्रियों में जीभ सबसे अधिक प्रचंड और बेकाबू है; इस दुनिया में जीभ को जीतना बहुत मुश्किल है। लेकिन आप, प्रिय कृष्ण, हमारे प्रति बहुत दयालु हैं और जीभ को नियंत्रित करने के लिए हमें इतना अच्छा प्रसाद दिया है। अब हम यह प्रसाद पूरी तरह से अपनी संतुष्टि के लिए लेते हैं और उनके प्रभु श्री श्री राधा-कृष्ण की महिमा करते हैं, और प्रेम में भगवान चैतन्य और भगवान नित्यानंद की मदद के लिए आह्वान करते हैं।"
