जिह्वयातिप्रमाथिन्या जनो रसविमोहित: ।
मृत्युमृच्छत्यसद्बुद्धिर्मीनस्तु बडिशैर्यथा ॥ १९ ॥
अनुवाद
जिस तरह जीभ का भोग करने की इच्छा से प्रेरित मछली मछुआरे के काँटे में फँस कर मारी जाती है, उसी तरह मूर्ख व्यक्ति जीभ की अत्यधिक उद्वेलित करने वाली उमंगों से मोहग्रस्त होकर विनष्ट हो जाता है।
Just as a fish, driven by the desire to enjoy the tongue, gets caught in a fisherman's hook and gets killed, so a foolish person gets deluded by the excessively agitated passions of the tongue and gets destroyed.
तात्पर्य
मछुआरे नुकीले काँटे पर मांसल चारा लगाते हैं और अनाड़ी मछली को आसानी से अपनी ओर आकर्षित करते हैं, जो अपनी जीभ के स्वाद का लालच करती है। इसी तरह, लोग अपनी जीभ को संतुष्ट करने के पीछे पागल हो जाते हैं और खान-पान में विवेक खो देते हैं। क्षणिक संतुष्टि के लिए वे विशाल बूचड़खाने बनाते हैं और लाखों निरीह जीवों को मार देते हैं, और ऐसी अत्याचारी पीड़ा पहुँचाकर वे अपने लिए एक भयानक भविष्य तैयार करते हैं। लेकिन अगर कोई वेदों में बताए गए आहारों का ही सेवन करता है, तब भी खतरा बना रहता है। व्यक्ति शानो-शौकत से ज्यादा खा सकता है और फिर कृत्रिम रूप से भरा हुआ पेट यौन अंगों पर दबाव डालता है। इस तरह वह प्रकृति के निम्न स्तरों पर गिर जाएगा और पापपूर्ण गतिविधियाँ करेगा जिससे उसके आध्यात्मिक जीवन की मृत्यु हो जाती है। मछली से जीभ को संतुष्ट करने में शामिल वास्तविक खतरों के बारे में सावधानी से सीखना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥