श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 8: पिंगला की कथा  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  11.8.18 
नृत्यवादित्रगीतानि जुषन् ग्राम्याणि योषिताम् ।
आसां क्रीडनको वश्य ऋष्यश‍ृङ्गो मृगीसुत: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
सुन्दरियों के सांसारिक गायन, नृत्य तथा संगीत-मनोरंजन में लीन होकर मृगी-पुत्र ऋष्यशृंग मुनि पूरी तरह उनके वश में हो गए, जैसे कि कोई पालतू जानवर होता है।
 
Attracted by the worldly songs, dances and musical entertainments of beautiful women, even the sage Rishyashringa, the son of a deer, came under their control as if he were a domesticated animal.
तात्पर्य
ऋष्यशृंग को उनके पिता ने जानबूझकर पूर्ण मासूमियत के वातावरण में पाला था। पिता को लगा कि यदि उनका बेटा कभी भी किसी स्त्री के संपर्क में नहीं आएगा तो वह हमेशा एक परिपूर्ण ब्रह्मचारी बना रहेगा। लेकिन संयोग से पड़ोसी राज्य के निवासी, जो लंबे समय से सूखे से पीड़ित थे, उन्हें दिव्य सलाह मिली कि बारिश उनके राज्य में तभी लौटेगी जब ऋष्यशृंग नामक ब्राह्मण वहां आएंगे। इसलिए वे ऋष्यशृंग के आश्रम में खूबसूरत महिलाओं को उन्हें लुभाने और अपने साथ वापस लाने के लिए भेजा। चूँकि ऋष्यशृंग ने स्त्री के बारे में कभी सुना भी नहीं था, इसलिए वे आसानी से उनके जाल में फंस गये।

ऋष्यशृंग नाम इस बात का प्रतीक है कि युवा ऋषि का जन्म उनके माथे से हिरण जैसे सींग के साथ हुआ था। यदि हिरण की तरह एक ऋषि मधुर संगीत की ध्वनियों से जुड़ जाता है जो इंद्रियों को तृप्त करने का वादा करती है, तो वह हिरण की तरह जल्दी से अभिभूत हो जाता है। एक विचारशील व्यक्ति को हिरण से विनम्रतापूर्वक निर्देश लेना चाहिए, जो संगीत की इंद्रिय संतुष्टि के आकर्षण के कारण बर्बाद हो जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)