सुदु:खोपार्जितैर्वित्तैराशासानां गृहाशिष: ।
मधुहेवाग्रतो भुङ्क्ते यतिर्वै गृहमेधिनाम् ॥ १६ ॥
अनुवाद
बिल्कुल उसी प्रकार जैसे एक शहद चोर मधुमक्खियों द्वारा बड़े ही परिश्रम से बनाई गई शहद को ले जाता है, वैसे ही ब्रह्मचारी और संन्यासी जैसे साधु-संत पारिवारिक भोग में समर्पित गृहस्थों द्वारा बहुत ही कष्ट सहकर संचित किए गए धन का भोग करने के अधिकारी हैं।
Just as a honey-thief steals the honey which has been painstakingly collected by the honeybees, similarly, saints and hermits like Brahmacari and Sanyasis are entitled to enjoy the wealth accumulated with great difficulty by householders devoted to family enjoyment.
तात्पर्य
शास्त्रों में कहा गया है: “सन्यास के जीवन क्रम के संत साधु और ब्रम्हाचारियों को पहले अतिथियों द्वारा उत्पादित उत्तम खाद्यपदार्थों का आनंद लेने का अधिकार है। यदि गृहस्थ इन खाद्यपदार्थों का आनंद लेते हैं पहले साधुओं को दान न देते हुए, तो ऐसे लापरवाह गृहस्थों को चांद्रायणम नामक चंद्र उपवास करना पड़ता है।” पारिवारिक जीवन में एक को प्रचुर मात्रा में दान देकर स्वार्थ की ओर प्राकृतिक प्रवृत्ति पर काबू पाना चाहिए। आधुनिक समाज मूर्खतापूर्ण ढंग से ऐसे वैदिक आदेशों का पालन नहीं करता है और नतीजतन, दुनिया ईर्ष्यालु गृह-मेधियों या परिवार जीवन में व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए पूरी तरह से और पूरी तरह से समर्पित व्यक्तियों से घिर गई है। इसलिए, पूरी दुनिया हिंसा और पीड़ा की एक बेकाबू ऐंठन में जकड़ी हुई है। यदि कोई शांति से रहना चाहता है तो उसे पारिवारिक जीवन को विनियमित करने वाले वैदिक आज्ञाओं का पालन करना चाहिए। हालाँकि गृहस्थ पैसा जमा करने के लिए बहुत मेहनत करते हैं, फिर भी संत संन्यासी और ब्रम्हाचारी ऐसे श्रम के फलों का आनंद लेने के पहले अधिकारी हैं। निष्कर्ष यह है कि किसी को कृष्ण चेतना में आध्यात्मिक उन्नति को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए और इस प्रकार अपने जीवन को पूर्ण करना चाहिए। तब व्यक्तिगत प्रयास के बिना भी, सभी की आवश्यकता भगवान के दया से पूरी हो जाएगी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥