श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 8: पिंगला की कथा  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  11.8.13 
पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि ।
स्पृशन् करीव बध्येत करिण्या अङ्गसङ्गत: ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
संत पुरुष को युवती के पास नहीं जाना चाहिए। उसे लकड़ी की बनी स्त्री की मूर्ति तक को छूना नहीं चाहिए। स्त्री के साथ शारीरिक संपर्क होने से वह मोह-माया में फंस जाएगा, जैसे हाथी मादा हाथी के शरीर को छूने की इच्छा के कारण पकड़ा जाता है।
 
A saintly person should not touch any young girl. In fact, he should not even touch a wooden doll in the form of a woman with his feet. If he has physical contact with a woman, he will surely be captured by Maya, just as an elephant is captured because of the desire to touch the body of a female elephant.
तात्पर्य
हाथियों को जंगल में निम्न प्रकार से पकड़ा जाता है। एक बड़ा गड्ढा खोदा जाता है और फिर उसपर घास, पत्तियाँ, मिट्टी आदि से ढ़क दिया जाता है। फिर एक मादा हाथी को नर हाथी के सामने प्रदर्शित किया जाता है, जो उसका पीछा करके उस गड्ढे में गिर जाता है और पकड़ लिया जाता है। हाथी से सीखने लायक बात यह है कि स्पर्श सुख को भोगने की इच्छा निश्चित रूप से जीवन को बर्बाद करने का कारण है। एक बुद्धिमान व्यक्ति, मादा हाथी के साथ खेलने के लिए हाथी की तीव्र प्रवृत्ति को देखते हुए, इस उत्कृष्ट उदाहरण को हृदय से अपनाएगा। इसलिए, किसी को स्त्री के कामुक रूप के प्रति आकर्षण द्वारा धोखा खाकर बचना चाहिए। किसी को भी अपने मन को यौन सुख के कामुक सपनों में खोने नहीं देना चाहिए। पुरुषों और महिलाओं के बीच भोगने के लिए विभिन्न प्रकार के इंद्रिय सुख हैं, जिनमें बोलना, चिंतन करना, स्पर्श करना, संभोग आदि शामिल हैं, और ये सभी भ्रम का ऐसा जाल तैयार करते हैं जिससे व्यक्ति एक जानवर की तरह असहाय रूप से बंध जाता है। किसी को यौन सुख के रूप में इंद्रिय सुख से किसी भी तरह से दूर रहना चाहिए; अन्यथा, आध्यात्मिक दुनिया को समझने की कोई संभावना नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)