सायन्तनं श्वस्तनं वा न सङ्गृह्णीत भिक्षुक: ।
मक्षिका इव सङ्गृह्णन् सह तेन विनश्यति ॥ १२ ॥
अनुवाद
एक साधु-संत को उसी दिन या अगले दिन खाने के लिए भी भोजन का संग्रह नहीं करना चाहिए। यदि वह इस निर्देश की अवहेलना करता है और मधुमक्खी के समान अधिक से अधिक स्वादिष्ट भोजन एकत्र करता है, तो उसने जो भी एकत्र किया है, वह निस्संदेह उसे नष्ट कर देगा।
A sadhu should not store food for the same day or even for the next day. If he disregards this command and, like a bee, stores up as much delicious food as possible, he will undoubtedly destroy whatever he has collected.
तात्पर्य
भ्रमर उस मधुमक्खी को कहा जाता है जो फूल-से-फूल भटकती रहती है, और माक्षिका वह मधुमक्खी है जो आसक्ति के साथ मधुमक्खी के छत्ते में अधिक-से-अधिक शहद जमा करती है। एक संत महात्मा को भ्रमर मधुमक्खी जैसा होना चाहिए क्योंकि अगर वह माक्षिका मधुमक्खी की नकल करेगा तो उसकी आध्यात्मिक चेतना नष्ट हो जाएगी। यह बिंदु इतना महत्वपूर्ण है कि इस छंद में दोहराया गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥