श्रीब्राह्मण उवाच
सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च ।
देहिनां यद् यथा दु:खं तस्मान्नेच्छेत तद् बुध: ॥ १ ॥
अनुवाद
साधु ब्राह्मण ने कहा: हे राजन, देहधारी जीव स्वर्ग या नरक में अपने आप दुख का अनुभव करता है। इसी तरह बिना ढूँढ़े ही उसे सुख की भी प्राप्ति हो जाती है। इसलिए समझदार और विवेकी व्यक्ति ऐसे भौतिक सुख को पाने के लिए कभी कोई प्रयास नहीं करता।
The sage-brahmin said: O King, the embodied soul experiences pain automatically in heaven or hell. Similarly, happiness is also experienced without seeking it. Therefore, an intelligent and prudent person never makes any effort to attain such material happiness.
तात्पर्य
मानव को निरर्थक ही अपनी ज़िन्दगी भौतिक कामुकताओं की पूर्ति के पीछे नहीं नष्ट करनी चाहिए क्यूंकि भौतिक सुख की एक निश्चित मात्रा वह स्वाभाविक ही अपने भूत और वर्तमान के कर्मो के फल के रूप में पा जाता है। यह शिक्षा अजगर या पाइथन से मिलती है, जो लेट कर अपनी ज़रूरतों के लिए वह स्वीकार कर लेता है जो उसे अपने आप ही प्राप्त हो जाता है। उल्लेखनीय है कि भौतिक स्वर्ग और नरक दोनों में सुख और दुख अपने पिछले कर्मो की वजह से अपने आप ही प्राप्त हो जाते हैं, यद्यपि सुख और दुख का अनुपात निश्चित ही अलग-अलग होता है। स्वर्ग या नरक, दोनों में ही कोई खा सकता है, पी सकता है, सो सकता है और यौन जीवन जी सकता है, लेकिन ये क्रियाएं, भौतिक शरीर आधारित होने के कारण, अस्थाई और नगण्य हैं। बुद्धिमान इंसान को यह देखना चाहिए कि सबसे अच्छी भौतिक स्थिति भी दरअसल पिछले कर्मो के लिए सजा है, जो ईश्वर की प्रेमपूर्ण भक्ति सेवा के दायरे से बाहर होकर किए हुए हों। एक सशर्त आत्मा थोड़ा सा सुख पाने के लिए बड़ी मुसीबत उठाती है। भौतिक जीवन में संघर्ष करने के बाद, जो कि कठिनाई और पाखंड से भरा होता है, वह थोड़ा-बहुत कामुक सुख पा लेता है, लेकिन यह काल्पनिक सुख उस पीड़ा के बोझ की भरपाई करने के लिए काफी नहीं होता है जिसे वह इसे पाने के लिए उठाता है। अंततः, एक खूबसूरत टोपी से बदसूरत चेहरे का इलाज नहीं हो सकता है। अगर सचमुच कोई जीवन की समस्याओं का समाधान चाहता है तो उसे सादगी से जीना चाहिए और अपनी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा कृष्ण की प्रेमपूर्ण सेवा में लगाना चाहिए। यहां तक कि जो लोग ईश्वर की सेवा नहीं भी करते उन्हें भी एक निश्चित स्तर का पोषण ईश्वर से प्राप्त होता है; इसलिए आप कल्पना कर सकते हैं कि उन भक्तों को ईश्वर कितनी सुरक्षा देते हैं जिन्होंने अपना जीवन प्रभु की सेवा में समर्पित कर दिया होता है। कच्चे कर्मठ मूर्खतापूर्वक केवल वर्तमान जीवन की ही चिंता करते हैं, जबकि कुछ और सज्जन कर्मठ भविष्य में होने वाली भौतिक कामवासनाओं के पूरे प्रबंध अविवेकपूर्ण ढंग से कर लेते हैं इस बात से अनजान कि सारा ऐसा आनंद अस्थाई होता है। हालाँकि, असली समाधान समझने में निहित है कि ईश्वर के व्यक्तित्व को प्रसन्न करके, जो कि सभी इंद्रियों और सभी इच्छाओं के स्वामी हैं, कोई स्थाई सुख प्राप्त कर सकता है। ऐसे ज्ञान से जीवन की समस्याएँ आसानी से सुलझ जाती हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥