श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  11.7.9 
तस्माद् युक्तेन्द्रियग्रामो युक्तचित्त इदम् जगत् ।
आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्वरे ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए अपनी सारी इन्द्रियों को अपने नियन्त्रण में रखते हुए, मन को वश में करके, सारे संसार को आत्मा के अन्दर स्थित देखो, जो सब जगह व्याप्त है। यही नहीं, तुम इस जीव को मुझ सर्वोच्च भगवान में भी देखो।
 
Therefore, by controlling all your senses and subduing the mind, you should see the whole universe situated within the soul, which is spread everywhere. Not only this, you should also see this soul within me, the Supreme Personality of Godhead.
तात्पर्य
वितातम या "व्यापक" शब्द का अर्थ है कि प्रत्येक जीव आत्मा सम्पूर्ण भौतिक सृष्टि में विद्यमान है। इसी प्रकार, भगवद-गीता (2.24) में भगवान कृष्ण कहते हैं, नित्य: सर्व-गति: : जीव आत्मा अनादि काल से है और सम्पूर्ण भौतिक एवं आध्यात्मिक जगत में विस्तारित है। हालाँकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक जीव आत्मा सर्व-व्याप्त है, बल्कि इसका अर्थ है कि परम पुरुषोत्तम, कृष्ण ने अपनी सीमांत शक्ति का विस्तार सर्वत्र किया है। अत: किसी को यह नहीं मानना चाहिए कि एक छोटा सा जीव भी सर्व-व्याप्त है; बल्कि उसे यह समझना चाहिए कि ईश्वर महान है और अपनी व्यक्तिगत शक्ति का विस्तार सर्वत्र करता है। इस श्लोक में आत्मनीक्षण वितातम का अर्थ है कि इस भौतिक जगत का निर्माण पराधीन आत्माओं की इंद्रिय-तृप्ति के लिए किया गया है, जो कृष्ण से विमुख होकर, अपने वास्तविक स्वामी से विमुख होकर, आनंद का उपभोग करने का प्रयास कर रहे हैं। जीव इकाइयाँ भगवान की बाह्य ऊर्जा का दोहन करने में व्यस्त हैं, लेकिन भौतिक जगत पर उनका अधिकार भ्रामक है। प्रकृति और पराधीन जीव दोनों ही भगवान की ऊर्जाएँ हैं और इस प्रकार वे भगवान के व्यक्तित्व के भीतर विद्यमान हैं और उनके परम नियंत्रण में हैं।

जीव इकाई भगवान की आनंद के लिए विद्यमान है और भगवान का शाश्वत सेवक है। जैसे ही इंद्रियाँ भौतिक तृप्ति में लीन हो जाती हैं, वे परम सत्य का अनुभव करने की अपनी शक्ति खो देती हैं। इंद्रियों की वास्तविक गतिविधि विष्णु, भगवान की संतुष्टि है, और सभी इंद्रियाँ व्यक्तिगत विशेषता में भगवान को देखकर और उनकी सेवा करके असीम आध्यात्मिक आनंद का अनुभव कर सकती हैं। हालाँकि, जो लोग ईश्वर की अवैयक्तिक अवधारणा को अपनाते हैं, वे सभी इंद्रिय गतिविधियों को रोकने का प्रयास करते हैं। लेकिन क्योंकि इंद्रियाँ स्थायी रूप से निष्क्रिय नहीं रह सकती हैं, वे स्वाभाविक रूप से भौतिक भ्रम के क्षेत्र में गतिविधियों में लौट आती हैं। यदि कोई इंद्रियों को भगवान की सेवा में लगाता है, तो उसे भगवान के रूप की अलौकिक सुंदरता को देखकर असीमित आनंद मिलता है। लेकिन जब तक कोई कृष्ण के प्रति विशुद्ध प्रेमपूर्ण भक्ति द्वारा खुद को योग्य नहीं बनाता, तब तक भगवान उसे यह उच्च अनुभव प्रदान नहीं करते। इसलिए, प्रत्येक बद्ध आत्मा को भगवान के आनंदमय साथ में फिर से जुड़कर भगवान से अपना अनावश्यक अलगाव समाप्त करना चाहिए। भगवान कृष्ण व्यक्तिगत रूप से पराधीन आत्माओं की बंद आँखों को फिर से खोलने के लिए नीचे उतरते हैं, और इस प्रकार भगवान व्यक्तिगत रूप से उद्धव को शिक्षा देते हैं ताकि भविष्य में भावपूर्ण आत्माएँ उनके निर्देशों का लाभ उठा सकें। वास्तव में, भगवद-गीता में अर्जुन को भगवान कृष्ण के निर्देशों से लाखों-करोड़ों लोग अब भी आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)