जीव इकाई भगवान की आनंद के लिए विद्यमान है और भगवान का शाश्वत सेवक है। जैसे ही इंद्रियाँ भौतिक तृप्ति में लीन हो जाती हैं, वे परम सत्य का अनुभव करने की अपनी शक्ति खो देती हैं। इंद्रियों की वास्तविक गतिविधि विष्णु, भगवान की संतुष्टि है, और सभी इंद्रियाँ व्यक्तिगत विशेषता में भगवान को देखकर और उनकी सेवा करके असीम आध्यात्मिक आनंद का अनुभव कर सकती हैं। हालाँकि, जो लोग ईश्वर की अवैयक्तिक अवधारणा को अपनाते हैं, वे सभी इंद्रिय गतिविधियों को रोकने का प्रयास करते हैं। लेकिन क्योंकि इंद्रियाँ स्थायी रूप से निष्क्रिय नहीं रह सकती हैं, वे स्वाभाविक रूप से भौतिक भ्रम के क्षेत्र में गतिविधियों में लौट आती हैं। यदि कोई इंद्रियों को भगवान की सेवा में लगाता है, तो उसे भगवान के रूप की अलौकिक सुंदरता को देखकर असीमित आनंद मिलता है। लेकिन जब तक कोई कृष्ण के प्रति विशुद्ध प्रेमपूर्ण भक्ति द्वारा खुद को योग्य नहीं बनाता, तब तक भगवान उसे यह उच्च अनुभव प्रदान नहीं करते। इसलिए, प्रत्येक बद्ध आत्मा को भगवान के आनंदमय साथ में फिर से जुड़कर भगवान से अपना अनावश्यक अलगाव समाप्त करना चाहिए। भगवान कृष्ण व्यक्तिगत रूप से पराधीन आत्माओं की बंद आँखों को फिर से खोलने के लिए नीचे उतरते हैं, और इस प्रकार भगवान व्यक्तिगत रूप से उद्धव को शिक्षा देते हैं ताकि भविष्य में भावपूर्ण आत्माएँ उनके निर्देशों का लाभ उठा सकें। वास्तव में, भगवद-गीता में अर्जुन को भगवान कृष्ण के निर्देशों से लाखों-करोड़ों लोग अब भी आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं।
