श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  11.7.8 
पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थो भ्रम: स गुणदोषभाक् ।
कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
जिसका चेतना भ्रम से व्याकुल है, वह भौतिक वस्तुओं के मूल्य और अर्थ में कई अंतर देखता है। इस प्रकार वह भौतिक अच्छाई और बुराई के मंच पर लगातार लगा रहता है और ऐसी अवधारणाओं से बंधा रहता है। भौतिक द्वैत में लीन रहते हुए, ऐसा व्यक्ति अनिवार्य कर्तव्यों के पालन, ऐसे कर्तव्यों का पालन न करने और निषिद्ध कार्यों को करने के बारे में सोचता रहता है।
 
One whose consciousness is deluded by Maya sees many differences in the value and meaning of material things. Thus he is constantly engaged in the level of material goodness and evil and bound by such concepts. While absorbed in material duality, such a person keeps imagining the fulfillment of obligatory duties, the non-fulfillment of such duties and the fulfillment of forbidden actions.
तात्पर्य
इस श्लोक में अस्तित्व के भ्रामक मानसिक पटल का वर्णन किया गया है। अयुक्तस्य शब्द उस बद्ध आत्मा को दर्शाता है जो अपने मन को परम पुरुष भगवान पर स्थिर नहीं रखता है। भगवद् गीता और अन्य वैदिक साहित्य में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि भगवान कृष्ण, परम सत्य, प्रत्येक वस्तु में विद्यमान हैं और प्रत्येक वस्तु भगवान में निहित है। इसकी तुलना इस उदाहरण से की जा सकती है, जब एक स्त्री किसी पुरुष से प्रेम करती है, वह उसे देखने के लिए सबसे अधिक उत्सुक होती है और वह उसे प्रतिदिन विभिन्न वस्त्रों में सजे देखती है। वास्तव में, स्त्री को वस्त्रों में कोई दिलचस्पी नहीं होती है, बल्कि उस पुरुष में होती है। इसी प्रकार, हर भौतिक वस्तु में परम पुरुष भगवान विद्यमान हैं; इसलिए, जिसने ईश्वर के प्रति प्रेम विकसित किया है, वह भगवान को लगातार और सर्वव्यापी रूप से देखता रहता है, न कि केवल भगवान को ढँकने वाली सतही भौतिक वस्तुओं को।

इस श्लोक में अयुक्तस्य शब्द उस व्यक्ति को दर्शाता है जो वास्तविकता के स्तर तक नहीं पहुँचा है। ऐसा व्यक्ति, भगवान कृष्ण की प्रेमपूर्ण भक्ति सेवा से वंचित होकर, भौतिक अनुभव के अनगिनत रूपों और स्वादों का आनंद लेने का प्रयास करता है। यह अस्थायी, भ्रामक अभिरुचि भ्रमित जीव की संवैधानिक भूमिका नहीं है, जो परम पुरुष भगवान, परम वास्तविकता के बारे में किसी भी जागरूकता के बिना रहता है। निस्संदेह, पदार्थ की दुनिया में विविधताएँ हैं। कुत्तों में वंशावली वाले पूडल और आम आवारा कुत्ते होते हैं और घोड़ों में घुड़दौड़ के घोड़े और बूढ़े धूसर घोड़े होते हैं। इसी तरह, कुछ मनुष्य सुंदर और शिक्षित होते हैं तो कुछ नीरस और साधारण होते हैं। कुछ धनी होते हैं तो कुछ गरीब। प्रकृति में हमें उपजाऊ भूमि और बंजर भूमि, हरी-भरी जंगल और बेकार रेगिस्तान, अमूल्य रत्न और रंगहीन पत्थर, बहती पारदर्शी नदियाँ और स्थिर गंदे तालाब मिलते हैं। मानव समाज में हमें सुख और दुख, प्रेम और घृणा, जीत और हार, युद्ध और शांति, जीवन और मृत्यु, इत्यादि मिलते हैं। हालाँकि, हमारी इनमें से किसी भी स्थिति के साथ कोई स्थायी संबंध नहीं है, क्योंकि हम शाश्वत आत्माएँ हैं, भगवान कृष्ण, परम पुरुष भगवान का अंश और भाग। वैदिक संस्कृति की व्यवस्था इस तरह से की गई है कि हर कोई परम पुरुष भगवान की संतुष्टि के लिए केवल अपने व्यवसायिक कर्तव्य का पालन करके आत्म-साक्षात्कार में पूर्ण हो सकता है। स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। हालाँकि, कुछ बद्ध आत्माएँ मानती हैं कि जीवन में पूर्ण पूर्णता परिवार, राष्ट्र, मानवता आदि की ओर से सामान्य, गैर-आध्यात्मिक कर्तव्यों को निभाकर प्राप्त की जा सकती है। अन्य लोगों की न तो ईश्वर की सेवा में और न ही महान सांसारिक गतिविधियों में कोई दिलचस्पी होती है, और कुछ अन्य ऐसे भी होते हैं जो सक्रिय रूप से पापपूर्ण जीवन का अनुसरण करते हैं। ऐसे पापी व्यक्ति आम तौर पर दोपहर बाद देर से उठते हैं और पूरी रात जागते हैं, नशीले पदार्थ लेते हैं और अवैध यौन संबंध बनाते हैं। ऐसा अंधेरा, नारकीय अस्तित्व तमो-गुण, अज्ञान के स्वभाव के प्रति आकर्षण के कारण होता है। अज्ञान के स्वभाव में किए जाने वाले कार्यों को विकर्म कहा जाता है, जैसा कि इस श्लोक में उल्लेख किया गया है। दुर्भाग्य से, न तो भौतिक रूप से जिम्मेदार व्यक्ति और न ही भौतिक रूप से गैर-जिम्मेदार व्यक्ति और न ही पापी व्यक्ति जीवन की वास्तविक पूर्णता, कृष्ण चेतना प्राप्त कर सकता है। हालाँकि विभिन्न समाज और विभिन्न व्यक्ति अच्छे और बुरे की अलग-अलग अवधारणाएँ रखते हैं, लेकिन सभी भौतिक चीजें अंततः हमारे शाश्वत स्वार्थ के संदर्भ में बेकार हैं, जो कि कृष्ण चेतना है। इस विचार को श्रीमद्-भागवतम (6.17.20) के छठे कांड में संत राजा चित्रकेतु द्वारा व्यक्त किया गया है:

गुण-प्रवाह एतस्मिन

कः शाप को न्वनुग्रहः

कः स्वर्गो नरकः को वा

किं सुखं दुःखमेव वा

"यह भौतिक संसार एक निरंतर बहने वाली नदी की लहरों के समान है। इसलिए, क्या अभिशाप है और क्या अनुग्रह है? स्वर्ग के ग्रह कौन से हैं और नरक के ग्रह कौन से हैं? वास्तव में सुख क्या है और वास्तव में दुख क्या है? क्योंकि लहरें निरंतर प्रवाहित होती हैं, उनमें से किसी का भी कोई शाश्वत प्रभाव नहीं होता है।" यह तर्क दिया जा सकता है कि चूंकि वेदों में विहित और निषिद्ध कार्य हैं, इसलिए वेद भौतिक दुनिया में अच्छे और बुरे की अवधारणा को भी स्वीकार करते हैं। हालाँकि, तथ्य यह है कि यह स्वयं वेद नहीं हैं बल्कि बंधी हुई आत्माएँ हैं जो भौतिक द्वंद्व में बँधी हुई हैं। वैदिक साहित्य का कार्य प्रत्येक व्यक्ति को उस स्तर पर संलग्न करना है जिस पर वह वर्तमान में स्थित है और धीरे-धीरे उसे जीवन की पूर्णता तक ऊपर उठाना है। भौतिक सद्गुण का तरीका स्वयं आध्यात्मिक नहीं है, लेकिन यह आध्यात्मिक जीवन को बाधित नहीं करता है। चूंकि भौतिक सद्गुण का तरीका किसी की चेतना को शुद्ध करता है और उच्चतर ज्ञान के लिए तड़प पैदा करता है, इसलिए यह आध्यात्मिक जीवन को आगे बढ़ाने के लिए एक अनुकूल मंच है, जैसे हवाई अड्डा यात्रा करने के लिए एक अनुकूल स्थान है। यदि कोई व्यक्ति न्यूयॉर्क से लंदन की यात्रा करने की इच्छा रखता है, तो निश्चित रूप से न्यूयॉर्क हवाई अड्डा यात्रा करने के लिए सबसे अनुकूल स्थान है। लेकिन अगर वह आदमी अपना विमान चूक जाता है, तो वह लंदन के किसी भी दूसरे व्यक्ति से ज़्यादा पास नहीं होता, जो हवाई अड्डे पर नहीं गया था। दूसरे शब्दों में, हवाई अड्डे का लाभ तभी सार्थक होता है जब कोई अपना विमान पकड़ लेता है। इसी तरह, आध्यात्मिक मंच तक पहुँचने के लिए भौतिक सद्गुण का तरीका सबसे अनुकूल स्थिति है। वेद बंधी हुई आत्मा को भौतिक सद्गुण के तरीके तक उठाने के लिए विभिन्न गतिविधियों को निर्धारित और निषिद्ध करते हैं, और उस बिंदु से उसे पारलौकिक ज्ञान द्वारा आध्यात्मिक मंच तक बढ़ना चाहिए। इसलिए यदि कोई कृष्ण चेतना के मंच पर नहीं आता है, तो भौतिक सद्गुण के तरीके तक उसकी ऊंचाई बेकार है, जैसे हवाई अड्डे की यात्रा उसके लिए बेकार है जो अपना विमान चूक जाता है। वेदों में ऐसे आदेश और निषेध हैं जो भौतिक चीजों में अच्छाई और बुराई को स्वीकार करते हैं, लेकिन वैदिक नियमों का अंतिम उद्देश्य आध्यात्मिक जीवन के लिए एक अनुकूल स्थिति बनाना है। यदि कोई व्यक्ति तुरंत आध्यात्मिक जीवन अपना सकता है तो प्रकृति के तरीकों के भीतर अनुष्ठानों के साथ समय बर्बाद करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए कृष्ण ने भगवद्-गीता (2.45) में अर्जुन को सलाह दी:

त्रि-गुण्य-विषया वेदा

निस्त्रै-गुण्यो भवारजुन

निर्द्वंद्वो नित्य-सत्त्व-स्थो

नियोग-क्षेम आत्मवान

"वेद मुख्य रूप से भौतिक प्रकृति के तीन तरीकों के विषय से निपटते हैं। इन तरीकों से ऊपर उठो, हे अर्जुन। उन सभी से परे हो जाओ। सभी द्वंद्वों और लाभ और सुरक्षा के लिए सभी चिंताओं से मुक्त हो जाओ, और आत्म में स्थापित हो जाओ।" इस संबंध में, श्रील माध्वाचार्य ने महाभारत से निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किए हैं:

स्वर्गाद्याश च गुणाः सर्वे

दोषाः सर्वे तथैव च

आत्मनः कर्तृता-भ्रांत्या

जायन्ते नात्र संशयः

"भौतिक दुनिया के भीतर, स्थित आत्माएँ स्वर्ग के ग्रहों पर रहने और पवित्र सुंदर महिलाओं के आनंद जैसे आकाशीय सुख को अच्छा और वांछनीय चीजें मानती हैं। इसी तरह, पीड़ादायक या दुखद परिस्थितियों को बुरा या बुरा माना जाता है। हालाँकि, भौतिक दुनिया में अच्छाई और बुराई की ऐसी सभी धारणा निस्संदेह इस मूलभूत गलती पर आधारित है कि स्वयं को, और भगवान को नहीं, सभी कार्यों का अंतिम कर्ता या कर्ता मानना।"

परमात्मानम एवैकं

कर्तारं वित्ति यः पुमान

स मुच्यतेऽस्मात् संसारात

परमात्मानम एति च

"दूसरी ओर, एक व्यक्ति जो जानता है कि भगवान भौतिक प्रकृति का वास्तविक नियंत्रक है, और यह अंततः वह है जो सब कुछ चला रहा है, वह भौतिक अस्तित्व के बंधन से खुद को मुक्त कर सकता है। ऐसा व्यक्ति भगवान के निवास स्थान पर जाता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)