Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 11.7.74: जिसने मनुष्य-जीवन पाया है, उसके लिए मुक्ति के द्वार पूरी तरह से खुले हुए हैं। किन्तु यदि मनुष्य इस कथा के मूर्ख पक्षी की तरह अपने परिवार में ही लिप्त रहता है, तो उसे ऐसा व्यक्ति समझा जाना चाहिए जो ऊँचे स्थान पर केवल फिसलने और गिरने के लिए चढ़ा हो। | bhagavat अध्याय 11.7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश । bhagavat स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जिसने मनुष्य-जीवन पाया है, उसके लिए मुक्ति के द्वार पूरी तरह से खुले हुए हैं। किन्तु यदि मनुष्य इस कथा के मूर्ख पक्षी की तरह अपने परिवार में ही लिप्त रहता है, तो उसे ऐसा व्यक्ति समझा जाना चाहिए जो ऊँचे स्थान पर केवल फिसलने और गिरने के लिए चढ़ा हो।
For one who has attained human life, the doors of salvation are wide open. But if man remains engrossed in his family like the foolish bird in this story, then he is like a person who has climbed to a high place only to fall down.
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध ग्यारह के अंतर्गत सातवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥