श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  11.7.68 
अहो मे पश्यतापायमल्पपुण्यस्य दुर्मते: ।
अतृप्तस्याकृतार्थस्य गृहस्त्रैवर्गिकोहत: ॥ ६८ ॥
 
 
अनुवाद
कबूतर ने कहा: हाय! देखो न, मैं किस तरह से बरबाद हो गया हूँ। मैं बड़ा ही मूर्ख हूँ, क्योंकि मैंने ठीक से पुण्य के काम नहीं किये। न तो मैं अपने आप को संतुष्ट कर सका, न ही जीवन के लक्ष्य को पूरा कर सका। मेरा प्यारा परिवार, जो मेरे धर्म, अर्थ और काम का आधार था, अब पूरी तरह से बर्बाद हो गया है।
 
The pigeon said: Alas! See how I have been ruined. It is clear that I am a great fool, because I did not perform the proper virtuous deeds. Neither could I satisfy myself, nor could I fulfill the goal of life. My beloved family, which was the basis of my religion, wealth and work, is now badly ruined.
तात्पर्य
श्रील श्रीधर स्वामी ने समझाया है कि, अतृप्तस्य शब्द यह बताता है कि कबूतर उस इंद्रिय तृप्ति से संतुष्ट नहीं था, जिसे वह हासिल कर चुका था। हालाँकि वह अपनी पत्नी, बच्चों और घोंसले से पूरी तरह से जुड़ा था, फिर भी वह उनका यथेष्ट आनंद नहीं ले सका, क्योंकि आखिरकार ऐसी चीजों में कोई संतुष्टि नहीं होती है। अकृतार्थस्य यह दर्शाता है कि, अब अपनी इंद्रिय तृप्ति के भविष्य के विस्तार के लिए उसकी आशाएँ और सपने भी बर्बाद हो गए थे। लोग आमतौर पर अपने "घर, प्यारे घर" को अपना घोंसला कहते हैं, और भविष्य की इंद्रिय तृप्ति के लिए अलग से रखा गया पैसा "नेस्ट एग" (भविष्य के लिए बचा हुआ पैसा) कहा जाता है। इसलिए, भौतिक दुनिया के सभी लव बर्ड्स को यह स्पष्ट रूप से ध्यान रखना चाहिए कि, उनकी तथाकथित पत्नी, बच्चे और भाग्य सभी को शिकारी के जाल में खींच लिया जाएगा। दूसरे शब्दों में, मृत्यु सब कुछ समाप्त कर देगी।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)