श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  11.7.6 
त्वं तु सर्वं परित्यज्य स्‍नेहं स्वजनबन्धुषु ।
मय्यावेश्य मन: सम्यक् समद‍ृग् विचरस्व गाम् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
अब तुम्हें अपने निजी मित्रों तथा सम्बन्धियों से अपने सारे नाते त्याग कर, अपने मन को मुझ पर एकाग्र कर देना चाहिए। इस तरह हमेशा मेरी भावना से अपने आपको सराबोर करके, तुम्हें सारी वस्तुओं को एकसमान दृष्टि से देखना चाहिए और पृथ्वी-भर में भ्रमण करना चाहिए।
 
Now you should abandon all relations with your personal friends and relatives and concentrate your mind on Me. Thus, always absorbed in Me, you should look at all things with an equal eye and travel throughout the earth.
तात्पर्य
श्रीमद् वीरराघव आचार्य ने समदृष्टि की अवधारणा को इस प्रकार समझाया है: सम-दृक् सर्वस्य ब्रह्मात्मकत्वानुसन्धान-रूप-सम-दृष्टिमान्। "जो आत्मज्ञान के मार्ग पर है, उसे हमेशा सभी अस्तित्व के परम आध्यात्मिक स्वरूप को देखने का प्रयास करना चाहिए।" इस श्लोक में मयी शब्द का अर्थ परमात्मनि है। मनुष्य को अपना मन ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व पर लगाना चाहिए, जो कि हर चीज का स्रोत है। इस प्रकार जैसे ही कोई पृथ्वी पर अपने जीवन को व्यतीत करता है, अपने आवंटित समय का उपयोग करता है, उसे सभी चीजों और सभी लोगों को पूर्ण सत्य, ईश्वर के व्यक्तित्व के अंग और पार्सल के रूप में देखने का अभ्यास करना चाहिए। चूंकि सभी जीवित संस्थाएँ कृष्ण के अंग और पार्सल हैं, इसलिए अंततः उन सभी की आध्यात्मिक स्थिति समान है। कृष्ण की अभिव्यक्ति होने के नाते भौतिक प्रकृति की भी एक समान आध्यात्मिक स्थिति होती है, लेकिन यद्यपि पदार्थ और आत्मा दोनों ही ईश्वर के व्यक्तित्व से उत्पन्न होते हैं, फिर भी वे बिल्कुल एक ही स्तर पर विद्यमान नहीं होते हैं। भगवद् गीता में कहा गया है कि आत्मा भगवान की श्रेष्ठ ऊर्जा है, जबकि भौतिक प्रकृति उनकी निम्न ऊर्जा है। हालाँकि, चूंकि भगवान कृष्ण सभी चीजों में समान रूप से उपस्थित हैं, इसलिए इस श्लोक में सम-दृक शब्द इंगित करता है कि अंततः मनुष्य को हर चीज के भीतर कृष्ण और कृष्ण के भीतर हर चीज को देखना चाहिए। इस प्रकार समदृष्टि इस दुनिया में मौजूद विविधताओं के परिपक्व ज्ञान के अनुकूल है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इस श्लोक पर टिप्पणी करते हैं। "पृथ्वी पर अपने प्रकट लीलाओं के अंत में, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व, कृष्ण ने अपने मन में इस प्रकार सोचा: 'पृथ्वी पर अपनी लीलाओं के दौरान, मैंने उन सभी भक्तों की इच्छाओं को संतुष्ट किया है जो मुझे देखने के लिए उत्सुक थे। मैंने कई हजार रानियों से विधिवत विवाह किया है, जिनकी अध्यक्षता रुक्मिणी ने की, जिसे मैंने व्यक्तिगत रूप से अपहरण कर लिया था, और मैंने विभिन्न स्थानों पर और विभिन्न माध्यमों से असंख्य राक्षसों को मार डाला है। मैंने वृंदावन, मथुरा, द्वारका, हस्तिनापुर और मिथिला जैसे शहरों में कई दोस्तों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों के साथ बैठकों, पुनर्मिलन और समारोहों में भाग लिया है, और इस प्रकार मैं लीलाओं के प्रदर्शन में लगातार आते-जाते रहा हूँ। "'मैंने पृथ्वी ग्रह के नीचे स्थित महान भक्तों को अपनी व्यक्तिगत संगति देने की भी व्यवस्था की। अपनी माँ देवकी को प्रसन्न करने और कंस द्वारा मारे गए उनके छह मृत पुत्रों को वापस करने के लिए, मैं सुतल ग्रह पर उतरा और अपने महान भक्त बलि महाराज को आशीर्वाद दिया। अपने आध्यात्मिक गुरु, सांदीपनि मुनि के मृत पुत्र को वापस करने के लिए, मैं व्यक्तिगत रूप से रविनादन या यमराज के दरबार में गया और इस प्रकार वह मुझे आमने-सामने देखने में सक्षम हो गया। मैंने स्वर्ग के निवासियों, जैसे माता आदिति और कश्यप मुनि को भी अपनी व्यक्तिगत संगति से आशीर्वाद दिया, जब मैं अपनी पत्नी सत्यभामा के लिए पारिजात का फूल चुराने के लिए वहां गया था। और महा-विष्णु के निवास के निवासियों, जैसे नंद, सुंनंद और सुदर्शन को प्रसन्न करने के लिए, मैं एक निराश ब्राह्मण के मृत बच्चों को पुनः प्राप्त करने के लिए महा-वैकुंठालोका गया। इस प्रकार, असंख्य भक्त जिन्होंने मुझे देखने की प्रबल इच्छा की, उन्हें उनकी प्रार्थनाओं का उद्देश्य प्राप्त हो गया है।

"दुर्भाग्य की बात है कि नर-नारायण ऋषि और अन्य महान परमहंस संत जो बद्रीकाश्रम में उनके साथ रहते हैं, हालाँकि मुझे देखने के लिए अधिक उत्सुक थे, लेकिन उनकी इच्छा कभी नहीं पूरी हो सकी। मैं 125 वर्ष पृथ्वी पर रहा और अब निर्धारित समय पूरा हो चुका है। अपने करतबों में व्यस्त रहने के कारण, मेरे पास इन महान संतों को अपना आशीर्वाद देने का समय नहीं था। फिर भी, उद्धव व्यावहारिक रूप से मेरे समान हैं। वह महान भक्त हैं और मेरी स्वयं की पारलौकिक संपन्नताओं को साझा करते हैं। इस प्रकार, मेरे लिए उन्हें बद्रीकाश्रम भेजना उचित व्यक्ति हैं। मैं उद्धव को पूर्ण पारलौकिक ज्ञान दूंगा जिससे व्यक्ति भौतिक दुनिया से अलग हो जाता है, और वह बदले में बद्रीकाश्रम में योग्य संतों को इस ज्ञान, भ्रम के राज्य को पार करने के विज्ञान को प्रदान कर सकता है। इस तरह वह उन्हें मेरे चरण कमलों की प्यारी भक्ति सेवा प्रदान करने की विधि सिखा सकते हैं। मेरे लिए प्रस्तुत ऐसी प्यारी भक्ति सेवा सबसे मूल्यवान खजाना है, और इस तरह के ज्ञान को सुनकर नर-नारायण जैसे महान संतों की इच्छाएं पूरी तरह से पूरी होंगी।

"'जो महान आत्माएं मेरे सामने आत्मसमर्पण कर चुकी हैं, वे हमेशा पारलौकिक ज्ञान और भौतिक दुनिया से अलगाव से सुसज्जित रहती हैं। कभी-कभी, अपनी भक्ति सेवा में व्यस्त रहने के कारण, वे मुझे भूल जाते दिख सकते हैं। हालाँकि, एक शुद्ध भक्त जिसने मेरे लिए प्रेम के मंच को प्राप्त किया है, वह हमेशा ऐसी निष्ठावान भक्ति द्वारा सुरक्षित रहेगा। भले ही ऐसे भक्त को अचानक अपना जीवन त्याग देना चाहिए जबकि अपने मन को मुझ पर दृढ़ता से तय करने की उपेक्षा करनी चाहिए, ऐसे भक्त की प्यारी भावनाएँ इतनी शक्तिशाली होती हैं कि वे उसे सभी सुरक्षा प्रदान करती हैं। भले ही थोड़े समय की विस्मृति हो, ऐसी भक्ति भक्त को मेरे चरण कमलों में लाएगी, जो साधारण, भौतिकवादी व्यक्तियों की दृष्टि से परे है। उद्धव मेरे शुद्ध भक्त हैं। मेरे बारे में ज्ञान और इस दुनिया से अलगाव उसके अंदर फिर से जगाया गया है क्योंकि वह मेरे साथ कभी नहीं छोड़ पाएगा। '"

श्री चैतन्य महाप्रभु के निष्ठावान सेवक अपने आध्यात्मिक गुरु और भगवान कृष्ण की खुशी के लिए इस कृष्ण चेतना आंदोलन को फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। वर्तमान समय में दुनिया के सभी हिस्सों में कृष्ण चेतना आंदोलन में हजारों भक्त पारलौकिक साहित्य को वितरित करने के लिए कठिन परिस्थितियों में लंबे समय तक काम कर रहे हैं और इस प्रकार सामान्य आबादी को प्रबुद्ध कर रहे हैं। इस प्रयास में भक्तों के पास कोई व्यक्तिगत प्रेरणा नहीं है, लेकिन वे बस अपने आध्यात्मिक गुरु को अपनी पुस्तकों को वितरित करके खुश करने के इच्छुक हैं। जो लोग इस साहित्य को प्राप्त करते हैं, उन्हें आमतौर पर कृष्ण चेतना का कोई पूर्व अनुभव नहीं होता है, फिर भी वे उन भक्तों की पवित्रता से इतने प्रभावित होते हैं कि वे उत्सुकता से किताबें और पत्रिकाएँ खरीदते हैं। कृष्ण चेतना को फैलाने के जबरदस्त कार्य को निष्पादित करने के लिए, भक्त दिन-रात अथक परिश्रम कर रहे हैं क्योंकि वे प्यारी भक्ति के मंच पर हैं। हालाँकि सतही तौर पर ऐसे व्यस्त भक्त कभी-कभी कृष्ण के चरण कमलों के बारे में सीधे नहीं सोच सकते हैं, लेकिन ऐसी प्रेमपूर्ण भक्ति निस्संदेह उन्हें कृष्ण के चरण कमलों में वापस ले जाएगी, और उनकी सेवा से प्रसन्न होकर, प्रभु स्वयं उनके व्यक्तिगत रूप पर उनके अविचल ध्यान को फिर से जगाएंगे। यही है भक्ति-योग की सुंदरता, जो पूरी तरह से और केवल भगवान के सर्व-दयालु व्यक्तित्व, श्री कृष्ण की दया पर निर्भर करती है। यह भौतिक भोग की गहरी इच्छाओं को उखाड़ फेंकने, कृष्ण के लिए शुद्ध प्रेम प्राप्त करने और भौतिक ब्रह्मांड से परे भगवान के राज्य तक जाने का एकमात्र पूरी तरह से सुरक्षित साधन है। जैसा कि भगवद-गीता (2.40) में कहा गया है:

नेहाभिक्रम-नाशोऽस्ति

प्रत्यवायो न विद्यते

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य

त्रायते महतो भयात्

भगवान कृष्ण ने इस श्लोक में उद्धव को सलाह दी कि इस भौतिक जगत में तथाकथित मित्रों और परिवार से मायावी लगाव को त्याग दें। व्यक्ति शारीरिक रूप से परिवार और दोस्तों का साथ नहीं छोड़ सकता है, लेकिन उसे समझना चाहिए कि हर कोई और हर चीज भगवान का अंश है और भगवान के सुख के लिए है। जैसे ही कोई सोचता है, "यह मेरा निजी परिवार है," तुरंत वह भौतिक जगत को पारिवारिक जीवन का आनंद लेने के स्थान से ज्यादा कुछ नहीं देखेगा। जैसे ही कोई अपने तथाकथित परिवार से जुड़ जाता है, झूठी प्रतिष्ठा और भौतिक अधिकारशीलता उत्पन्न होती है। वास्तव में, हर कोई भगवान का अंश है और इसलिए, आध्यात्मिक मंच पर, यह सभी अन्य संस्थाओं से संबंधित है। इसे कृष्ण-संबंध या कृष्ण के साथ संवैधानिक संबंध कहा जाता है। आध्यात्मिक जागरूकता के उच्चतम स्तर पर आगे बढ़ना असंभव है और साथ ही समाज, दोस्ती और प्रेम की एक क्षुद्र भौतिक अवधारणा को बनाए रखना भी असंभव है। व्यक्ति को कृष्ण-संबंध के उच्च, आध्यात्मिक मंच पर सभी संबंधों का अनुभव करना चाहिए, जिसका अर्थ है भगवान कृष्ण, भगवान के व्यक्तित्व के संबंध में सब कुछ देखना। जो व्यक्ति कृष्ण के साथ अपने संवैधानिक संबंध में स्थित है, वह सभी चीजों को कृष्ण के संबंध में देख सकता है। इस प्रकार वह शरीर, मन और वाणी के सांसारिक आग्रहों को छोड़ देता है और प्रभु के भक्त के रूप में पूरी पृथ्वी पर भ्रमण करता है। इस तरह के उच्च ऊर्जा वाले व्यक्तित्व को गोस्वामी या इंद्रियों का स्वामी कहा जाता है। इस चरण को भगवद-गीता (18.54) में ब्रह्म-भूतः प्रसन्न आत्मा शब्दों द्वारा वर्णित किया गया है: आध्यात्मिक मंच पर व्यक्ति पूर्ण संतुष्टि प्राप्त करता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)