"दुर्भाग्य की बात है कि नर-नारायण ऋषि और अन्य महान परमहंस संत जो बद्रीकाश्रम में उनके साथ रहते हैं, हालाँकि मुझे देखने के लिए अधिक उत्सुक थे, लेकिन उनकी इच्छा कभी नहीं पूरी हो सकी। मैं 125 वर्ष पृथ्वी पर रहा और अब निर्धारित समय पूरा हो चुका है। अपने करतबों में व्यस्त रहने के कारण, मेरे पास इन महान संतों को अपना आशीर्वाद देने का समय नहीं था। फिर भी, उद्धव व्यावहारिक रूप से मेरे समान हैं। वह महान भक्त हैं और मेरी स्वयं की पारलौकिक संपन्नताओं को साझा करते हैं। इस प्रकार, मेरे लिए उन्हें बद्रीकाश्रम भेजना उचित व्यक्ति हैं। मैं उद्धव को पूर्ण पारलौकिक ज्ञान दूंगा जिससे व्यक्ति भौतिक दुनिया से अलग हो जाता है, और वह बदले में बद्रीकाश्रम में योग्य संतों को इस ज्ञान, भ्रम के राज्य को पार करने के विज्ञान को प्रदान कर सकता है। इस तरह वह उन्हें मेरे चरण कमलों की प्यारी भक्ति सेवा प्रदान करने की विधि सिखा सकते हैं। मेरे लिए प्रस्तुत ऐसी प्यारी भक्ति सेवा सबसे मूल्यवान खजाना है, और इस तरह के ज्ञान को सुनकर नर-नारायण जैसे महान संतों की इच्छाएं पूरी तरह से पूरी होंगी।
"'जो महान आत्माएं मेरे सामने आत्मसमर्पण कर चुकी हैं, वे हमेशा पारलौकिक ज्ञान और भौतिक दुनिया से अलगाव से सुसज्जित रहती हैं। कभी-कभी, अपनी भक्ति सेवा में व्यस्त रहने के कारण, वे मुझे भूल जाते दिख सकते हैं। हालाँकि, एक शुद्ध भक्त जिसने मेरे लिए प्रेम के मंच को प्राप्त किया है, वह हमेशा ऐसी निष्ठावान भक्ति द्वारा सुरक्षित रहेगा। भले ही ऐसे भक्त को अचानक अपना जीवन त्याग देना चाहिए जबकि अपने मन को मुझ पर दृढ़ता से तय करने की उपेक्षा करनी चाहिए, ऐसे भक्त की प्यारी भावनाएँ इतनी शक्तिशाली होती हैं कि वे उसे सभी सुरक्षा प्रदान करती हैं। भले ही थोड़े समय की विस्मृति हो, ऐसी भक्ति भक्त को मेरे चरण कमलों में लाएगी, जो साधारण, भौतिकवादी व्यक्तियों की दृष्टि से परे है। उद्धव मेरे शुद्ध भक्त हैं। मेरे बारे में ज्ञान और इस दुनिया से अलगाव उसके अंदर फिर से जगाया गया है क्योंकि वह मेरे साथ कभी नहीं छोड़ पाएगा। '"
श्री चैतन्य महाप्रभु के निष्ठावान सेवक अपने आध्यात्मिक गुरु और भगवान कृष्ण की खुशी के लिए इस कृष्ण चेतना आंदोलन को फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। वर्तमान समय में दुनिया के सभी हिस्सों में कृष्ण चेतना आंदोलन में हजारों भक्त पारलौकिक साहित्य को वितरित करने के लिए कठिन परिस्थितियों में लंबे समय तक काम कर रहे हैं और इस प्रकार सामान्य आबादी को प्रबुद्ध कर रहे हैं। इस प्रयास में भक्तों के पास कोई व्यक्तिगत प्रेरणा नहीं है, लेकिन वे बस अपने आध्यात्मिक गुरु को अपनी पुस्तकों को वितरित करके खुश करने के इच्छुक हैं। जो लोग इस साहित्य को प्राप्त करते हैं, उन्हें आमतौर पर कृष्ण चेतना का कोई पूर्व अनुभव नहीं होता है, फिर भी वे उन भक्तों की पवित्रता से इतने प्रभावित होते हैं कि वे उत्सुकता से किताबें और पत्रिकाएँ खरीदते हैं। कृष्ण चेतना को फैलाने के जबरदस्त कार्य को निष्पादित करने के लिए, भक्त दिन-रात अथक परिश्रम कर रहे हैं क्योंकि वे प्यारी भक्ति के मंच पर हैं। हालाँकि सतही तौर पर ऐसे व्यस्त भक्त कभी-कभी कृष्ण के चरण कमलों के बारे में सीधे नहीं सोच सकते हैं, लेकिन ऐसी प्रेमपूर्ण भक्ति निस्संदेह उन्हें कृष्ण के चरण कमलों में वापस ले जाएगी, और उनकी सेवा से प्रसन्न होकर, प्रभु स्वयं उनके व्यक्तिगत रूप पर उनके अविचल ध्यान को फिर से जगाएंगे। यही है भक्ति-योग की सुंदरता, जो पूरी तरह से और केवल भगवान के सर्व-दयालु व्यक्तित्व, श्री कृष्ण की दया पर निर्भर करती है। यह भौतिक भोग की गहरी इच्छाओं को उखाड़ फेंकने, कृष्ण के लिए शुद्ध प्रेम प्राप्त करने और भौतिक ब्रह्मांड से परे भगवान के राज्य तक जाने का एकमात्र पूरी तरह से सुरक्षित साधन है। जैसा कि भगवद-गीता (2.40) में कहा गया है:
नेहाभिक्रम-नाशोऽस्ति
प्रत्यवायो न विद्यते
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य
त्रायते महतो भयात्
भगवान कृष्ण ने इस श्लोक में उद्धव को सलाह दी कि इस भौतिक जगत में तथाकथित मित्रों और परिवार से मायावी लगाव को त्याग दें। व्यक्ति शारीरिक रूप से परिवार और दोस्तों का साथ नहीं छोड़ सकता है, लेकिन उसे समझना चाहिए कि हर कोई और हर चीज भगवान का अंश है और भगवान के सुख के लिए है। जैसे ही कोई सोचता है, "यह मेरा निजी परिवार है," तुरंत वह भौतिक जगत को पारिवारिक जीवन का आनंद लेने के स्थान से ज्यादा कुछ नहीं देखेगा। जैसे ही कोई अपने तथाकथित परिवार से जुड़ जाता है, झूठी प्रतिष्ठा और भौतिक अधिकारशीलता उत्पन्न होती है। वास्तव में, हर कोई भगवान का अंश है और इसलिए, आध्यात्मिक मंच पर, यह सभी अन्य संस्थाओं से संबंधित है। इसे कृष्ण-संबंध या कृष्ण के साथ संवैधानिक संबंध कहा जाता है। आध्यात्मिक जागरूकता के उच्चतम स्तर पर आगे बढ़ना असंभव है और साथ ही समाज, दोस्ती और प्रेम की एक क्षुद्र भौतिक अवधारणा को बनाए रखना भी असंभव है। व्यक्ति को कृष्ण-संबंध के उच्च, आध्यात्मिक मंच पर सभी संबंधों का अनुभव करना चाहिए, जिसका अर्थ है भगवान कृष्ण, भगवान के व्यक्तित्व के संबंध में सब कुछ देखना। जो व्यक्ति कृष्ण के साथ अपने संवैधानिक संबंध में स्थित है, वह सभी चीजों को कृष्ण के संबंध में देख सकता है। इस प्रकार वह शरीर, मन और वाणी के सांसारिक आग्रहों को छोड़ देता है और प्रभु के भक्त के रूप में पूरी पृथ्वी पर भ्रमण करता है। इस तरह के उच्च ऊर्जा वाले व्यक्तित्व को गोस्वामी या इंद्रियों का स्वामी कहा जाता है। इस चरण को भगवद-गीता (18.54) में ब्रह्म-भूतः प्रसन्न आत्मा शब्दों द्वारा वर्णित किया गया है: आध्यात्मिक मंच पर व्यक्ति पूर्ण संतुष्टि प्राप्त करता है।
