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श्लोक 11.7.56  |
यं यं वाञ्छति सा राजन् तर्पयन्त्यनुकम्पिता ।
तं तं समनयत् कामं कृच्छ्रेणाप्यजितेन्द्रिय: ॥ ५६ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजन, जब भी कबूतरी को किसी चीज़ की इच्छा होती, तो वह चापलूसी और मीठी-मीठी बातों से अपने पति को मना लेती और वह अपनी इच्छा पूरी करने के लिए बड़ी-बड़ी मुश्किलें उठाकर भी उसे वही दिलाता जो वह चाहती थी। इस तरह वह उसके साथ में रहते हुए अपनी इंद्रियों पर काबू नहीं रख सका। |
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| हे राजन, जब भी कबूतरी को किसी चीज़ की इच्छा होती, तो वह चापलूसी और मीठी-मीठी बातों से अपने पति को मना लेती और वह अपनी इच्छा पूरी करने के लिए बड़ी-बड़ी मुश्किलें उठाकर भी उसे वही दिलाता जो वह चाहती थी। इस तरह वह उसके साथ में रहते हुए अपनी इंद्रियों पर काबू नहीं रख सका। |
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