श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  11.7.56 
यं यं वाञ्छति सा राजन् तर्पयन्त्यनुकम्पिता ।
तं तं समनयत् कामं कृच्छ्रेणाप्यजितेन्द्रिय: ॥ ५६ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन, जब भी कबूतरी को किसी चीज़ की इच्छा होती, तो वह चापलूसी और मीठी-मीठी बातों से अपने पति को मना लेती और वह अपनी इच्छा पूरी करने के लिए बड़ी-बड़ी मुश्किलें उठाकर भी उसे वही दिलाता जो वह चाहती थी। इस तरह वह उसके साथ में रहते हुए अपनी इंद्रियों पर काबू नहीं रख सका।
 
O King, whenever the dove desired anything, she would flatter her husband and force him to do what she desired, and he himself would do what she desired, even at great difficulty. Thus he could not control his senses in her company.
तात्पर्य
शब्द "तरपयंती" दर्शाता है कि नर कबूतर को रिझाने में मादा कबूतर बहुत कुशल थी, वो उसे मुस्कुराहट और प्यार भरी बातों से लुभाती थी। इस तरह उसकी महान भावनाओं को प्रभावित करती थी और उसे अपना वफादार नौकर बनाने में सफल हो जाती थी। बेचारा कबूतर "अजितेन्द्रिय" था, यानी वो अपनी इंद्रियों को वश में नहीं कर पाता था और किसी स्त्री की सुंदरता के आगे उसका दिल आसानी से पिघल जाता था। ब्राह्मण अवधूत इस कहानी को दो कबूतरों और उनके वियोग में पड़ी भयानक तकलीफों के बारे में सुनाते हुए मूल्यवान निर्देश दे रहा है। अगर हमारी बुद्धि इंद्रियों के सर्वोच्च स्वामी हृषीकेश की सेवा में समर्पित नहीं है, तो निस्संदेह हम भौतिक सुख की अज्ञानता में डूब जाएंगे। तब हम एक मूर्ख कबूतर से भी बदतर हो जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)