श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  11.7.54 
कपोतौ स्‍नेहगुणितहृदयौ गृहधर्मिणौ ।
द‍ृष्टिं द‍ृष्‍ट्याङ्गमङ्गेन बुद्धिं बुद्ध्या बबन्धतु: ॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
कबूतरों का यह जोड़ा अपने घरेलू कार्यों में बहुत तल्लीन था। भावुक प्रेम ने उनके हृदयों को बांध रखा था और वे एक-दूसरे की ओर टकटकी लगाकर, शारीरिक गुणों और मनोदशाओं से आकर्षित थे। इस तरह उन्होंने एक-दूसरे को प्रेम के बंधन से पूरी तरह जकड़ रखा था।
 
This pair of pigeons was extremely devoted to their domestic duties. Their hearts were bound together by emotional affection, they were attracted to each other's glances, physical qualities and states of mind. Thus they had completely bound each other with affection.
तात्पर्य
नर-मादा कबूतर एक-दूसरे की ओर इतने आकर्षित थे कि वे एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलगाव को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। इसे भगवद्-विस्मति, या परमेश्वर को भूल जाना और मृत पदार्थ से लगाव कहा जाता है। जीवित इकाई में प्रभु के लिए एक शाश्वत प्रेम है, लेकिन जब विकृत हो जाता है, तो वह प्रेम झूठे भौतिक स्नेह के रूप में प्रकट होता है। वास्तविक आनंद का एक धुंधला प्रतिबिंब इस तरह निरपेक्ष सत्य को भूलने पर आधारित झूठे जीवन की नींव बन जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)