किसी व्यक्ति या किसी वस्तु के प्रति अत्यधिक स्नेह या चिंता कभी नहीं करनी चाहिए, अन्यथा व्यक्ति को बहुत दुख भोगना पड़ेगा, जिस तरह मूर्ख कबूतर को भोगना पड़ा।
A person should not show excessive affection or concern for any person or thing. Otherwise, he will have to suffer great misery, just like the foolish pigeon did.
तात्पर्य
संस्कृत उपसर्ग अति, या "अतिशयोक्ति," उस स्नेह या आसक्ति का संकेत देता है जिसमें कृष्ण चेतना नहीं है। भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (5.29) में कहा है, सुहृदं सर्व-भूतनाम्: भगवान प्रत्येक जीव का सनातन शुभचिंतक है। भगवान इतने स्नेही हैं कि वे प्रत्येक बद्ध जीव के हृदय में बैठते हैं और माया के राज्य में उसके अंतहीन भटकने में उसका साथ देते हैं, धैर्यपूर्वक बद्ध जीव के भगवतधाम, घर वापस आने का इंतजार करते हैं। इस प्रकार भगवान प्रत्येक जीव की सनातन सुख-समृद्धि के लिए सभी प्रबंध करते हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए सभी जीवों के लिए करुणा और स्नेह दिखाने का सबसे अच्छा तरीका भगवान कृष्ण की ओर से उपदेशक बनना और गिरी हुई आत्माओं को पुनः उबारने में भगवान की सहायता करना है। यदि दूसरों के प्रति हमारा स्नेह या आसक्ति सामाजिक संबंध, मित्रता और प्रेम के नाम पर शारीरिक इंद्रिय सुख पर आधारित है, तो वह अत्यधिक, अवांछित स्नेह (अति-स्नेह) संबंध के टूटने या नाश के समय में जलन भरा दर्द पैदा करेगा। अब मूर्ख कबूतर की कहानी सुनाई जाएगी। ऐसी ही एक कहानी श्रीमद-भागवतम के सप्तम स्कंध, द्वितीय अध्याय में वर्णित है, जिसे यमराज ने राजा सुयज्ञ की शोकाकुल विधवाओं को सुनाई थी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥