श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  11.7.51 
बुध्यते स्वे न भेदेन व्यक्तिस्थ इव तद्गत: ।
लक्ष्यते स्थूलमतिभिरात्मा चावस्थितोऽर्कवत् ॥ ५१ ॥
 
 
अनुवाद
विविध वस्तुओं से परावर्तित होने पर भी सूर्य कभी विभाजित नहीं होता, न ही अपने प्रतिबिम्ब में लीन होता है। केवल मन्द बुद्धि वाले लोग ही सूर्य के विषय में ऐसा सोचते हैं। उसी प्रकार आत्मा विभिन्न भौतिक शरीरों से प्रतिबिम्बित होते हुए भी अविभाजित और अभौतिक रहता है।
 
Even after being reflected from various objects, the Sun is neither divided nor absorbed in its own reflection. Only those with a dull intellect think this way about the Sun. Similarly, the soul remains undivided and immaterial even after being reflected from various physical bodies.
तात्पर्य
सूरज बहुत सी वस्तुओं में दिखाई देता है, जैसे खिड़कियां, शीशे, चमकीली धातु, तेल, पानी आदि, फिर भी सूरज एक और अविभाज्य रहता है। इसी तरह शरीर के अंदर मौजूद अनादि आत्मा भौतिक शरीर की परदा के माध्यम से दिखाई देता है। इस तरह आत्मा बूढ़ी या जवान, मोटी या पतली, खुश या उदास दिखाई देती है। आत्मा अमेरिकन, रूसी, अफ्रीकन, हिंदू या ईसाई दिखाई दे सकती है; हालाँकि, अपनी नैसर्गिक अवस्था में अनादि आत्मा किसी भी भौतिक पदनाम से मुक्त होती है।

इस पद में शब्द स्थूलमतिभिः उन लोगों को इंगित करता है जिनकी बुद्धि स्थूल और मंद होती है। एक बाहरी कला प्रदर्शनी में एक कुत्ते द्वारा कीमती पेंटिंग पर पेशाब करने का हमारे पास व्यावहारिक अनुभव है। अपनी मंद बुद्धि के कारण, कुत्ता पेंटिंग के वास्तविक मूल्य की सराहना नहीं कर सका। इसी तरह, जब तक कोई कृष्ण चेतना को नहीं अपना लेता, तब तक वह मानव जीवन के अमूल्य अवसर का घोर दुरुपयोग कर रहा होता है। मानव जीवन आत्म-साक्षात्कार के लिए होता है, और हमें पूंजीवादी, कम्युनिस्ट, अमेरिकी, रूसी आदि जैसे भौतिक पदनामों पर झगड़ने में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, सभी लोगों को भगवान की प्रेममयी भक्ति सेवा को अपनाना चाहिए और अपनी शाश्वत, शुद्ध पहचान का एहसास करना चाहिए। सूर्य को उसकी प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति को देखकर समझना चाहिए, न कि भौतिक वस्तुओं पर उसके विकृत प्रतिबिंब से। इसी तरह, किसी भी जीवित प्राणी को भौतिक पदनामों की विकृत अभिव्यक्ति से परे उसकी शुद्ध आध्यात्मिक पहचान के संदर्भ में विचार करना चाहिए।

इस श्लोक में शब्द आत्मा का अर्थ भगवान के परम व्यक्तित्व का भी है। जैसे हम भौतिक शरीर के प्रतिबिंब के माध्यम से साधारण जीव आत्माओं को देखने की प्रवृत्ति रखते हैं, वैसे ही हम भगवान के व्यक्तित्व को हमारे भौतिक मन के विकृत परदे के माध्यम से देखने की प्रवृत्ति रखते हैं। इस प्रकार, हम भगवान की कल्पना अवैयक्तिक या भौतिक या अगम्य के रूप में करते हैं। जब आकाश में बादल छाए रहते हैं, तो सूर्य का प्रकाश सूर्य की उच्चतम संभव धारणा है, जो बादलों से ढका होता है। इसी तरह, जब किसी का मन मानसिक अटकलों से धुंधला होता है, तो कोई भगवान के पारलौकिक शरीर से निकलने वाले प्रकाश को सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्य मान सकता है। हालाँकि, जब मन एक बादल रहित नीले आकाश की तरह निर्मल रूप से स्पष्ट होता है, तो व्यक्ति भगवान के व्यक्तित्व के वास्तविक रूप, भगवान कृष्ण को देख सकता है। सत्य को पूर्ण रूप से सशर्त आत्मा के ढंके हुए मन से नहीं समझा जा सकता है; बल्कि कृष्ण चेतना के शुद्ध नीले आकाश के माध्यम से प्रभु को देखना चाहिए, जो फल की इच्छाओं और मानसिक अटकलों से मुक्त होता है। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर गाते हैं:

जीवेर कल्याण-साधना-काम

जगते आसि' ए मधुर नाम

अविद्या-तिमिर-तापना-रूपे

हृद-गगने विराजे

"भगवान कृष्ण का पवित्र नाम केवल सशर्त आत्माओं को आशीर्वाद देने के लिए भौतिक दुनिया के अंधेरे में उतरता है। भगवान कृष्ण का पवित्र नाम सूर्य की तरह है जो भक्तों के हृदय के निर्मल आकाश में उगता है।" ऐसा शानदार ज्ञान उन लोगों द्वारा नहीं समझा जा सकता है जो प्रभु की भौतिक सृष्टि का शोषण करने के लिए या तो धर्म या नास्तिकता के नाम पर प्रयास कर रहे हैं। व्यक्ति को भगवान कृष्ण का शुद्ध भक्त बनना चाहिए, और फिर उसका ज्ञान हर दिशा में सब कुछ प्रकाशित करेगा: कस्मिन नु भगवो विज्ञाते सर्वं इदं विज्ञातं भवतीति (मुंडक उपनिषद 1.3)।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)