गुणैर्गुणानुपादत्ते यथाकालं विमुञ्चति ।
न तेषु युज्यते योगी गोभिर्गा इव गोपति: ॥ ५० ॥
अनुवाद
ठीक उसी तरह जैसे सूर्य अपनी प्रखर किरणों से पर्याप्त मात्रा में पानी को वाष्पीकृत करता है और बाद में उसे बारिश के रूप में पृथ्वी पर लौटा देता है, उसी प्रकार एक संत अपनी भौतिक इंद्रियों के माध्यम से सभी प्रकार की भौतिक वस्तुओं को स्वीकार करता है और उचित समय आने पर, जब कोई उचित व्यक्ति उनसे विनती करने के लिए आता है, तो वह उन भौतिक वस्तुओं को लौटा देता है। इस प्रकार वह इंद्रियों की वस्तुओं को स्वीकार करने और छोड़ने दोनों में ही उलझता नहीं है।
Just as the sun evaporates a considerable amount of water with its intense rays and later returns that water to the earth in the form of rain, similarly a saint accepts all kinds of material objects with his physical senses and when the right person approaches him to return them, he returns those material objects. In this way he is not caught in both accepting and rejecting sense objects.
तात्पर्य
एक कृष्ण भावान्वित व्यक्ति कभी भी उस ऐश्वर्य पर स्वामित्व का अनुभव नहीं करता जो उसे कृष्ण भावनामृत आंदोलन के प्रसार के लिए भगवान् कृष्ण द्वारा सौंपा गया है। भगवान् कृष्ण के भक्तों को मात्र भौतिक संपत्ति का संचय नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें भगवान् कृष्ण के ऐश्वर्य का इस तरह वितरण करना चाहिए कि कृष्ण भावनामृत आंदोलन असीमित रूप से फैले। यह सूर्य से सीखने लायक एक सीख है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥