न वस्तव्यं त्वयैवेह मया त्यक्ते महीतले ।
जनोऽभद्ररुचिर्भद्र भविष्यति कलौ युगे ॥ ५ ॥
अनुवाद
हे उद्धव, जब मैं इस दुनिया से चलूँ जाऊँ, तो तुमको इस धरती पर नहीं रहना चाहिए। हे प्रिय भक्त, तुम पापरहित हो, किंतु कलियुग में लोग सब तरह के पापाचारों में लिप्त रहेंगे, इसलिए तुमको यहाँ नहीं रुकना चाहिए।
O Uddhava, when I have left this world, you should not remain on this earth. O dear devotee, you are sinless, but in Kali-yuga people will indulge in all kinds of sinful activities, so you should not stay here.
तात्पर्य
इस कलि युग में, मनुष्य पूरी तरह से अनजान हैं कि भगवान स्वयं पृथ्वी पर अपने आध्यात्मिक लीलाओं को प्रकट करने के लिए आते हैं जैसा कि वे आध्यात्मिक दुनिया में होते हैं। भगवान के अधिकार की उपेक्षा करते हुए, कलि-युग की पतित आत्माएं कटु कलह में उलझ जाती हैं और एक दूसरे को क्रूरता से परेशान करती हैं। क्योंकि कलि-युग में लोग प्रदूषित, पापपूर्ण गतिविधियों के आदी होते हैं, वे हमेशा क्रोधित, कामुक और निराश रहते हैं। कलि-युग में भगवान के भक्त, जो भगवान की सदैव बढ़ती हुई प्रेममय सेवा में लगे रहते हैं, उन्हें कभी भी पृथ्वी पर रहने के लिए आकर्षित नहीं होना चाहिए, जिसकी जनसंख्या अज्ञानता के अंधकार में ढकी हुई है और भगवान के साथ किसी भी प्रेमपूर्ण संबंध से रहित है। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने उद्धव को सलाह दी कि वे कलि-युग में पृथ्वी पर न रहें। वास्तव में, भगवद्-गीता में भगवान सभी जीवों को सलाह देते हैं कि उन्हें कभी भी भौतिक ब्रह्मांड के भीतर-किसी भी युग में नहीं रहना चाहिए। इसलिए प्रत्येक जीव को भौतिक दुनिया की समग्र बेकार प्रकृति को समझने और भगवान कृष्ण के चरण कमलों में अपने आप को समर्पित करने के लिए कलि-युग के दबाव का लाभ उठाना चाहिए। श्री उद्धव के पदचिन्हों पर चलते हुए, व्यक्ति को कृष्ण के प्रति समर्पण करना चाहिए और वापस घर, वापस भगवान के पास जाना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥