श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  11.7.47 
स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्ल‍क्षणं विभु: ।
प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोऽग्निरिवैधसि ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार आग विभिन्न आकारों और गुणों वाले काष्ठ-खंडों में अलग-अलग रूपों में प्रकट होती है, उसी प्रकार सर्वव्यापी सर्वोच्च आत्मा अपनी स्वयं की शक्ति से उत्पन्न उच्च और निम्नतर जीवन रूपों के शरीरों में प्रवेश करके प्रत्येक के स्वरूप को धारण करता प्रतीत होता है।
 
Just as fire appears in different forms in pieces of wood of various shapes and qualities, so the Almighty God appears to enter the bodies of the higher and lower species created by His power and assume the form of each one.
तात्पर्य
यद्यपि परमप्रभु हर चीज के भीतर हैं, लेकिन हर चीज प्रभु नहीं है। श्रेष्ठता के मोड से प्रभु देवताओं व ब्राह्मणों के महान भौतिक शरीर बनाते हैं और अज्ञानता के मोड का विस्तार करते हुए वैसी ही तरह जानवरों, शूद्रों और जीवन के अन्य निम्न रूपों के शरीर बनाते हैं। प्रभु इन सभी श्रेष्ठ और निम्न श्रेणी के प्राणियों में प्रवेश करते हैं, लेकिन वह सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु रहते हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर समझाते हैं कि यद्यपि आग सुलगती लकड़ी के भीतर मौजूद होती है, यह तब जलती है जब हम लकड़ी को चारों ओर घुमाते हैं। इसी तरह, यद्यपि भगवान हर जगह अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद होते हैं, जब हम प्रेम और भक्ति से उनकी महिमा का गान और श्रवण करते हैं तो प्रभु प्रकट होते हैं और सीधे अपने भक्तों के सामने प्रकट होते हैं। मूर्ख सशर्त आत्माएं हर चीज में प्रभु की शानदार उपस्थिति को नजरअंदाज करती हैं और इसके बजाय अपनी औसत चेतना को अपने अस्थायी भौतिक आवरणों में सोख लेती हैं, यह सोचकर, "मैं एक मजबूत आदमी हूं," "मैं एक खूबसूरत महिला हूं," "मैं इस शहर का सबसे अमीर आदमी हूं," "मैं एक पीएच.डी. हूँ," और इसी तरह। ऐसे व्यर्थ उलझाव को काट देना चाहिए और इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि कोई शुद्ध आध्यात्मिक आत्मा है, जो भगवान कृष्ण का शाश्वत, आनंदमय सेवक है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)