श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  11.7.46 
क्व‍‍चिच्छन्न: क्व‍‍चित् स्पष्ट उपास्य: श्रेय इच्छताम् ।
भुङ्क्ते सर्वत्र दातृणां दहन् प्रागुत्तराशुभम् ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
संत अग्नि की तरह कभी प्रछन्न रूप में तो कभी प्रकट रूप में दिखाई पड़ते हैं। वास्तविक सुख की इच्छा रखने वाले संसार में बँधे प्राणियों के कल्याण के लिए संत गुरु का पूजनीय पद स्वीकार कर लेते हैं और अग्नि की तरह अपने भक्तों के गत और भविष्य के सभी पापों को दया करके अपनी स्वीकृति देकर भस्म कर देते हैं।
 
A saintly person is like fire, sometimes appearing in a hidden form and sometimes in a visible form. For the welfare of the conditioned souls who seek true happiness, a saintly person can accept the revered position of a Guru and in this way, like fire, he mercifully accepts the sacrifices of his worshippers and burns away past and future sins.
तात्पर्य
संत पुरुष अपनी महान आध्यात्मिक स्थिति को छिपाना पसंद करते हैं, लेकिन दुनिया के दुखी लोगों को उपदेश देने के लिए वह कभी-कभी अपनी महानता को प्रकट करते हैं। इसकी तुलना उस आग से की जाती है जो कभी राख में बिना देखे जलती है और कभी खुले तौर पर धधकती है। जिस प्रकार आग यज्ञ करने वालों द्वारा दी गई घी और अन्य भेंटों को खा जाती है, उसी प्रकार एक संत व्यक्ति अपने अनुयायियों द्वारा की गई प्रशंसा को स्वीकार करते हैं, यह जानते हुए कि वास्तव में सभी प्रशंसा सर्वोच्च प्रभु कृष्ण के लिए है। हालाँकि एक साधारण व्यक्ति उसकी प्रशंसा होने पर तुरंत घमंडी और मूर्ख बन जाता है, लेकिन एक संत व्यक्ति में ऐसी अशुभ प्रवृत्तियाँ परम सत्य के प्रति उसके लगाव से राख हो जाती हैं। इस तरह, वह आग की तरह ही है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)