श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  11.7.45 
तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षोदरभाजन: ।
सर्वभक्ष्योऽपि युक्तात्मा नादत्ते मलमग्निवत् ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
संत-पुरुष तपस्या के ज़रिए शक्तिमान बनते हैं। उनकी चेतना अचल रहती है क्योंकि वे भौतिक दुनिया की किसी भी चीज़ का भोग नहीं करना चाहते। ऐसे सहज मुक्त संत-पुरुष भाग्य द्वारा दिए गए भोजन को स्वीकार करते हैं और अगर संयोग से वे दूषित भोजन कर भी लें, तो भी उन पर कोई असर नहीं पड़ता। ठीक वैसे ही जैसे आग उन गंदी चीज़ों को जला देती है जो उसमें डाली जाती हैं।
 
Saints become powerful by performing tapasya. Their consciousness remains unshakeable because they do not want to enjoy any object of the material world. Such naturally liberated saints accept the food provided by destiny and if they eat contaminated food, it does not affect them in any way, just as fire burns the contaminated objects that are thrown into it.
तात्पर्य
udara-bhājana शब्द इस बात का संकेत है कि एक संत केवल शरीर और आत्मा को एक साथ रखने के लिए ही खाता है न कि इंद्रियों को तृप्त करने के लिए। व्यक्ति को अपने मन को खुशमिजाज बनाए रखने के लिए स्वादिष्ट भोजन का सेवन करना चाहिए; हालाँकि, किसी को भी विलासितापूर्ण भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे यौन इच्छा और आलस्य आएगा। एक संत हमेशा एक सच्चा सज्जन होता है और वह कभी भी लालची या कामुक नहीं होता है। हालाँकि माया उसे विभिन्न भौतिक प्रलोभनों की पेशकश करके उसे हराने की कोशिश करती है, लेकिन अंततः ये आकर्षक भौतिक विशेषताएँ स्वयं एक संत की आध्यात्मिक शक्ति से पराजित हो जाती हैं। इस प्रकार, कभी भी आध्यात्मिक रूप से उन्नत व्यक्तित्व का अनादर नहीं करना चाहिए, बल्कि श्रद्धापूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिए। कृष्ण-भावना से प्रेरित व्यक्तित्व के पास लापरवाही से जाना बिलकुल ऐसा ही है जैसे लापरवाही से आग के पास जाना, जो अगर ठीक से नहीं संभाला गया तो तुरंत जल जाए। भगवान किसी शुद्ध भक्त के साथ दुर्व्यवहार को माफ नहीं करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)