इस संबंध में, श्रील माध्वाचार्य ने संकेत दिया है कि व्यक्तिगत जीव को अपने दिव्य आध्यात्मिक गुणों को पुनर्जीवित करने के लिए संघर्ष करना चाहिए। जीव सर्वोच्च सत्ता कृष्ण का अभिन्न अंग है, और इस प्रकार से व्यक्तिगत आत्मा भी ईश्वरीय गुणों का भंडार है। यद्यपि, ईश्वर स्वतः ही बिना किसी बाधा के इन गुणों को प्रकट करता है, जबकि बद्ध आत्मा को ऐसे गुणों को पुनर्जीवित करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इस प्रकार, यद्यपि ईश्वर और जीव दोनों ही शाश्वत और पारलौकिक हैं, ईश्वर सदैव सर्वोच्च है। बुद्धि के साथ इन सब बातों को समझकर, बद्ध आत्मा आध्यात्मिक मंच पर उठ सकता है।
