श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  11.7.43 
तेजोऽबन्नमयैर्भावैर्मेघाद्यैर्वायुनेरितै: ।
न स्पृश्यते नभस्तद्वत् कालसृष्टैर्गुणै: पुमान् ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि प्रबल वायु आकाश में बादलों और झंझावातों को ले जाती है, लेकिन आकाश इन कार्यों से कभी प्रभावित नहीं होता। उसी तरह आत्मा भौतिक प्रकृति के संपर्क से न तो बदली जाती है, न ही प्रभावित होती है। हालाँकि जीव मिट्टी, पानी और आग से बने शरीर में प्रवेश करता है और शाश्वत काल द्वारा निर्मित तीनों गुणों से प्रेरित होता है, फिर भी उसकी शाश्वत आध्यात्मिक प्रकृति कभी प्रभावित नहीं होती।
 
Although strong winds blow clouds and storms through the sky, the sky is never affected by these actions. Similarly, the soul is not changed or affected by the touch of material nature. Although the living entity enters a body composed of earth, water and fire, and although he is conditioned by the three modes of action produced by eternal time, his eternal spiritual nature is never affected.
तात्पर्य
यद्यपि आकाश पवन, वर्षा, बवंडर, बिजली और बादलों जैसी प्रचंड गतिविधियों से प्रभावित प्रतीत होता है, किंतु आकाश, अतिसूक्ष्म होने के कारण, वास्तव में प्रभावित नहीं होता, बल्कि इस प्रकार की दृश्य गतिविधियों का पृष्ठभूमि मात्र है। ठीक इसी तरह, यद्यपि भौतिक शरीर और मन जन्म और मृत्यु, सुख और दुख, प्रेम और घृणा जैसे असंख्य परिवर्तनों से गुजरते हैं, शाश्वत जीव इन गतिविधियों के लिए केवल एक पृष्ठभूमि मात्र है। आत्मा, अतिसूक्ष्म होने के कारण, वास्तव में प्रभावित नहीं होती, बल्कि केवल शरीर और मन की सतही गतिविधियों के साथ तादात्म्य स्थापित करने के कारण ही आत्मा को भौतिक जगत में भयानक कष्ट का अनुभव होता है।

इस संबंध में, श्रील माध्वाचार्य ने संकेत दिया है कि व्यक्तिगत जीव को अपने दिव्य आध्यात्मिक गुणों को पुनर्जीवित करने के लिए संघर्ष करना चाहिए। जीव सर्वोच्च सत्ता कृष्ण का अभिन्न अंग है, और इस प्रकार से व्यक्तिगत आत्मा भी ईश्वरीय गुणों का भंडार है। यद्यपि, ईश्वर स्वतः ही बिना किसी बाधा के इन गुणों को प्रकट करता है, जबकि बद्ध आत्मा को ऐसे गुणों को पुनर्जीवित करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इस प्रकार, यद्यपि ईश्वर और जीव दोनों ही शाश्वत और पारलौकिक हैं, ईश्वर सदैव सर्वोच्च है। बुद्धि के साथ इन सब बातों को समझकर, बद्ध आत्मा आध्यात्मिक मंच पर उठ सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)