बालाऽग्र-शत-भागस्य
शतधा कल्पितस्य च
भागो जीव: स विज्ञेय:
स चानन्त्यय कल्पते
"जब एक बाल के ऊपरी सिरे को सौ भागों में विभाजित किया जाता है और फिर से ऐसे प्रत्येक भाग को सौ भागों में विभाजित किया जाता है, तो ऐसा प्रत्येक भाग आत्मा के आयाम का माप है।" वही श्रीमद-भागवतम में कहा गया है:
केशाऽग्र-शत-भागस्य
शतांश: सादृशात्मक:
जीव: सूक्ष्म-स्वरूपोऽयं
संख्यातीतो हि चित्-कण:
"आध्यात्मिक परमाणुओं के असंख्य कण हैं, जिन्हें बाल के ऊपरी हिस्से के दस-हज़ारवें हिस्से के रूप में मापा जाता है।"
हालाँकि, भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं क्योंकि वह स्वयं व्यक्तिगत रूप से हर जगह मौजूद हैं। भगवान को अद्वैत या अविभाज्य के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार, भगवान का वही अद्वितीय व्यक्तित्व हर जगह मौजूद है, आकाश की तरह, और फिर भी किसी भी चीज़ से जुड़ा नहीं है, हालाँकि सब कुछ उसके भीतर ही है। भगवान ने स्वयं भगवद्-गीता (9.6) में अपनी सर्वव्यापकता के इस विश्लेषण की पुष्टि की है:
यथाकाश-स्थितो नित्यं
वायु: सर्वत्र-गो महान
तथा सर्वाणि भूतानि
मत-स्थानीत्य उपधारय
"जैसे सर्वशक्तिमान पवन, हर जगह बहते हुए, हमेशा आकाश में रहता है, जानिए कि उसी तरह सभी प्राणी मुझमें ही निवास करते हैं।"
इसलिए, हालांकि जीव आत्मा और परमात्मा दोनों को सर्वव्यापी कहा जाता है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि असंख्य व्यक्तिगत जीव आत्माएं हैं, जबकि भगवान का केवल एक सर्वोच्च व्यक्तित्व है। भगवान हमेशा सर्वोच्च होते हैं, और जो वास्तव में एक विचारशील ऋषि होता है वह कभी भी भगवान की सर्वोच्च स्थिति पर संदेह नहीं करता है।
