श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  11.7.42 
अन्तर्हितश्च स्थिरजङ्गमेषु
ब्रह्मात्मभावेन समन्वयेन ।
व्याप्त्याव्यवच्छेदमसङ्गमात्मनो
मुनिर्नभस्त्वं विततस्य भावयेत् ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
एक विचारवान साधक को, सांसारिक शरीर के भीतर रहते हुए भी, स्वयं को शुद्ध आत्मा समझना चाहिए। इसी प्रकार, व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि आत्मा सभी प्रकार के जीवों में प्रवेश करती है, चाहे वे गतिशील हों या निश्चल, और इस प्रकार, व्यक्तिगत आत्माएँ सर्वव्यापी हैं। साधक को यह भी देखना चाहिए कि ईश्वर, एक तेजस्वी आत्मा के रूप में, सभी वस्तुओं में एक साथ विद्यमान हैं। व्यक्तिगत आत्मा और परम आत्मा दोनों को आकाश की प्रकृति से तुलना करके समझा जा सकता है: हालाँकि आकाश सर्वव्यापी है और हर चीज आकाश के भीतर स्थित है, लेकिन आकाश किसी भी चीज से नहीं मिलता और न ही किसी चीज से विभाजित किया जा सकता है।
 
Even while living within the physical body, the thoughtful sadhu should think of himself as pure soul. Similarly, one should see that the soul enters into all kinds of living beings—animate and inanimate—and thus the individual soul is omnipresent. The sadhu should also see that the Lord as Paramatma is present within all things at the same time. The soul and the Supersoul can be understood by comparing them with the nature of space. Although space is spread everywhere and all things rest within space, space neither mixes with anything nor can be divided by anything.
तात्पर्य
हालांकि वायु आकाश के भीतर मौजूद है, लेकिन आकाश या स्थान वायु से अलग है। वायु के अभाव में भी, स्थान या आकाश मौजूद है। सभी भौतिक वस्तुएँ स्थान के भीतर या विशाल भौतिक आकाश के भीतर स्थित हैं, लेकिन आकाश अविभाजित रहता है और, यद्यपि सभी वस्तुओं को समायोजित करता है, वास्तव में कभी किसी भी चीज़ के साथ मिश्रित नहीं होता है। इसी प्रकार व्यक्तिगत आत्मा और परमात्मा दोनों की स्थिति को समझा जा सकता है। व्यक्तिगत आत्मा सर्वव्यापी है, क्योंकि असंख्य जीव हैं, जो सभी चीजों में प्रवेश करते हैं; फिर भी, जैसा कि वैदिक साहित्य में पुष्टि की गई है, प्रत्येक व्यक्तिगत आत्मा असीम बनी रहती है। श्वेताश्वतर उपनिषद (5.9) में कहा गया है:

बालाऽग्र-शत-भागस्य

शतधा कल्पितस्य च

भागो जीव: स विज्ञेय:

स चानन्त्यय कल्पते

"जब एक बाल के ऊपरी सिरे को सौ भागों में विभाजित किया जाता है और फिर से ऐसे प्रत्येक भाग को सौ भागों में विभाजित किया जाता है, तो ऐसा प्रत्येक भाग आत्मा के आयाम का माप है।" वही श्रीमद-भागवतम में कहा गया है:

केशाऽग्र-शत-भागस्य

शतांश: सादृशात्मक:

जीव: सूक्ष्म-स्वरूपोऽयं

संख्यातीतो हि चित्-कण:

"आध्यात्मिक परमाणुओं के असंख्य कण हैं, जिन्हें बाल के ऊपरी हिस्से के दस-हज़ारवें हिस्से के रूप में मापा जाता है।"

हालाँकि, भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं क्योंकि वह स्वयं व्यक्तिगत रूप से हर जगह मौजूद हैं। भगवान को अद्वैत या अविभाज्य के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार, भगवान का वही अद्वितीय व्यक्तित्व हर जगह मौजूद है, आकाश की तरह, और फिर भी किसी भी चीज़ से जुड़ा नहीं है, हालाँकि सब कुछ उसके भीतर ही है। भगवान ने स्वयं भगवद्-गीता (9.6) में अपनी सर्वव्यापकता के इस विश्लेषण की पुष्टि की है:

यथाकाश-स्थितो नित्यं

वायु: सर्वत्र-गो महान

तथा सर्वाणि भूतानि

मत-स्थानीत्य उपधारय

"जैसे सर्वशक्तिमान पवन, हर जगह बहते हुए, हमेशा आकाश में रहता है, जानिए कि उसी तरह सभी प्राणी मुझमें ही निवास करते हैं।"

इसलिए, हालांकि जीव आत्मा और परमात्मा दोनों को सर्वव्यापी कहा जाता है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि असंख्य व्यक्तिगत जीव आत्माएं हैं, जबकि भगवान का केवल एक सर्वोच्च व्यक्तित्व है। भगवान हमेशा सर्वोच्च होते हैं, और जो वास्तव में एक विचारशील ऋषि होता है वह कभी भी भगवान की सर्वोच्च स्थिति पर संदेह नहीं करता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)