श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  11.7.41 
पार्थिवेष्विह देहेषु प्रविष्टस्तद्गुणाश्रय: ।
गुणैर्न युज्यते योगी गन्धैर्वायुरिवात्मद‍ृक् ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में आत्म-साक्षात्कारी आत्मा विभिन्न भौतिक शरीरों में निवास कर सकती है और उनके विविध गुणों और कार्यों का अनुभव कर सकती है, लेकिन वह उनमें कभी उलझती नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे हवा विभिन्न सुगंधों को ले जाती है, लेकिन वह उनमें घुल-मिल नहीं जाती।
 
In this world, the self-realized soul may live in various material bodies, experiencing their various qualities and activities, but it never gets entangled in them, just as the wind carries various fragrances but never gets mixed up in them.
तात्पर्य
यद्यपि हम हवा को सुगंधित या दुर्गंधित अनुभव करते हैं, यह उन सुगंधों पर निर्भर करता है जो यह ले जाती है, वास्तव में हवा अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं बदलती है। इसी तरह, यद्यपि हम किसी विशेष व्यक्ति को मजबूत या कमजोर, बुद्धिमान या मंदबुद्धि, सुंदर या साधारण, अच्छा या बुरा मानते हैं, वास्तविक व्यक्ति जो शुद्ध आत्मा है, उसके पास वास्तव में शरीर के किसी भी गुण नहीं होते हैं, बल्कि केवल उनके द्वारा कवर किया जाता है, जैसा कि हवा अलग-अलग सुगंधों से ढकी होती है। इस प्रकार, एक कृष्ण-भावना वाला व्यक्ति हमेशा यह जानता है कि वह अस्थायी शरीर से भिन्न है। वह शरीर के विभिन्न रूपांतरणों का अनुभव करता है, जैसे कि बचपन, किशोरावस्था, वयस्कता और बुढ़ापा; लेकिन यद्यपि वह उस शरीर के दर्द, सुख, गुणों और कार्यों का अनुभव करता है, एक कृष्ण-भावना वाला व्यक्ति कभी नहीं सोचता कि वह शरीर है। वह हमेशा समझता है कि वह एक शाश्वत आत्मा है, जो भगवान कृष्ण का अभिन्न अंग है। जैसा कि इस श्लोक में कहा गया है, न युज्यते योगी: वह उलझा हुआ नहीं है। निष्कर्ष यह है कि किसी को भी एक कृष्ण-भावना वाले व्यक्ति को शारीरिक पदनाम के संदर्भ में नहीं देखना चाहिए, बल्कि उसे भगवान का शाश्वत सेवक समझना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)