श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  11.7.40 
विषयेष्वाविशन् योगी नानाधर्मेषु सर्वत: ।
गुणदोषव्यपेतात्मा न विषज्जेत वायुवत् ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
पारलौकिक विचार वाले व्यक्ति के इर्द-गिर्द भी अनगिनत सांसारिक वस्तुएं होती हैं, जिनमें अच्छे और बुरे दोनों गुण मौजूद होते हैं। परन्तु जिसने सांसारिक भलाई और बुराई से ऊपर उठ लिया हो, उसे उन सांसारिक वस्तुओं के सम्पर्क में रहते हुए भी उनमें उलझना नहीं चाहिए, बल्कि उसे वायु की भाँति कार्य करना चाहिए।
 
Even a Yogi is surrounded by numerous material objects which have good and bad qualities. But one who has transcended material good and evil should not get entangled in them even while being in contact with material objects, rather he should act like air.
तात्पर्य
वायु वायु का बाह्य रूप है, जबकि प्राण इसका आंतरिक रूप है। जब वायु झरने के ऊपर से गुज़रती है तो वह अपने साथ थोड़ा-बहुत साफ़ पानी भी लाती है और इस तरह से वह बहुत अधिक तरोताज़ा हो जाती है। कई बार, वायु किसी खुबसूरत जंगल से गुज़रती है और अपने साथ में फल-फूलों की खुशबू लाती है। कई बार वायु किसी आग में ईंधन का काम करती है और उसी जंगल को राख कर देती है। हालाँकि, वायु अपने स्वरूप में हमेशा अडिग रहती है और अपने शुभ-अशुभ दोनों ही कार्यों को करने में निष्पक्ष रहती है। ठीक इसी तरह, इस भौतिक जगत में हमें सुखद और घृणित, दोनों ही तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। परन्तु, अगर हम कृष्ण चेतना में अडिग रहें, तो हम अशुभ से विचलित नहीं होंगे और ना ही हम भौतिक स्तर पर शुभ में आसक्त होंगे। अपने आध्यात्मिक कर्मों के चलते, एक भक्त कई बार देखता है कि वह खूबसूरत ग्रामीण इलाकों में हरे कृष्णा का जाप कर रहा है, और कई बार वह खुद को नारकीय शहर में भी यही करता हुआ देखता है। भक्त दोनों ही परिस्थिति में अपना मन कृष्ण पर टिकाए रहता है और पारलौकिक आनंद का अनुभव करता है। हालाँकि वायु सबसे अधिक अंधेरे वाली और भयानक जगहों से भी गुज़रती है, फिर भी वह ना तो डरती है ना ही विचलित होती है। ठीक इसी तरह, कृष्ण का भक्त कभी भी भयभीत या चिंताग्रस्त नहीं होना चाहिए, तब भी नहीं जब वह सबसे कठिन परिस्थिति में हो। जो भौतिक स्तर पर आनंददायक रूपों, स्वादों, गंधों, ध्वनियों और स्पर्शों में आसक्त होता है, वह प्रत्येक श्रेणी में विपरीत परिस्थितियों से घृणा भी करेगा। इस तरह, बहुत सारी अच्छी-बुरी चीज़ों से घिरा हुआ भौतिकवादी लगातार विचलित रहता है। जब वायु बहुत सारी दिशाओं में एक साथ चलती है, तो वातावरण अस्थिर हो जाता है। ठीक इसी तरह, अगर मन लगातार भौतिक चीजों की तरफ आकर्षित और प्रतिकर्षित होता रहे, तो इतनी अधिक मानसिक अशांति हो जाएगी कि परम सत्य के बारे में सोचना असंभव हो जाएगा। इसलिए, व्यक्ति को वायु से यह कला सीखनी चाहिए कि भौतिक जगत में बिना आसक्ति के कैसे घूमा जाए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)