श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  11.7.4 
यर्ह्येवायं मया त्यक्तो लोकोऽयं नष्टमङ्गल: ।
भविष्यत्यचिरात्साधो कलिनापि निराकृत: ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
हे साधु उद्धव, मैं जल्द ही इस पृथ्वी को छोड़ दूँगा। तब कलियुग से प्रभावित होकर यह पृथ्वी पवित्रता से रहित हो जाएगी।
 
O saintly Uddhava, I shall leave this earth in the near future. Then this earth will be devoid of all purity, overwhelmed by the Kali Yuga.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण की योजना उद्धव को एक संक्षिप्त विलंब के बाद अपने शाश्वत निवास पर वापस लाना था। उद्धव के असाधारण आध्यात्मिक गुणों के कारण, भगवान उन लोगों के बीच उनके संदेश को प्रचारित करने में उन्हें संलग्न करना चाहते थे जो अभी तक शुद्ध भक्ति-सेवा के स्तर पर उन्नत नहीं थे। हालाँकि, भगवान ने उद्धव को आश्वासन दिया कि वह एक पल के लिए भी भगवान के सहयोग से वंचित नहीं होंगे। इसके अलावा, क्योंकि उद्धव अपनी इंद्रियों के पूर्ण स्वामी बन गए थे, वे कभी भी भौतिक प्रकृति के तीनों रूपों से प्रभावित नहीं होंगे। इस तरह, उद्धव को वापस घर लाने से पहले, वापस भगवान के पास, भगवान ने उन्हें एक विशिष्ट गोपनीय मिशन को पूरा करने के लिए सशक्त बनाया।

जहाँ कहीं भी भगवान के व्यक्तित्व के सर्वोच्च पद को मान्यता नहीं दी जाती है, बेकार मानसिक अटकलें बहुत प्रमुख हो जाती हैं, और पूर्ण वैदिक ज्ञान को सुनने का सुरक्षित और निश्चित मार्ग मानसिक अवधारणा की अराजकता से ढका हुआ हो जाता है। वर्तमान समय में, विशेष रूप से पश्चिमी देशों में, सचमुच में लाखों पुस्तकें सैकड़ों और हजारों विषयों पर प्रकाशित हो रही हैं; लेकिन मानसिक अवधारणा के इस प्रसार के बावजूद लोग मानव जीवन के सबसे बुनियादी मुद्दों, अर्थात्, मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? मैं कहाँ जा रहा हूँ? मेरी आत्मा क्या है? भगवान क्या है?

भगवान का व्यक्तित्व, भगवान श्री कृष्ण, असंख्य मोहक शगलों का भंडार है, और इस प्रकार वे असंख्य प्रकार के आनंद के स्रोत हैं। वास्तव में, वे शाश्वत आनंद का सागर हैं। जब शाश्वत आत्मा प्रभु की प्रेमपूर्ण सेवा से आने वाले संवैधानिक आनंद से वंचित हो जाती है, तो वह अभिभूत और भौतिक प्रकृति से व्याकुल हो जाती है। वह असहाय रूप से भौतिक भाव-प्राप्ति के पीछे भागता है, यह सोच कर कि एक भौतिक वस्तु अच्छी है और दूसरी खराब है, और लगातार अच्छा और बुरा क्या है, इसका अपना मूल्यांकन बदलता जाता है। इस तरह वह कोई शांति या आनंद प्राप्त नहीं करता है, लगातार चिंता में रहता है और बार-बार जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग के रूप में प्रकृति के क्रूर कानूनों से थ्रेश किया जाता है।

इस तरह, बद्ध आत्मा कलियुग में जन्म लेने के लिए एक योग्य उम्मीदवार बन जाती है, जो दुर्भाग्य का प्रतीक है। कलियुग में जीव जो पहले से ही इतने कष्ट भुगत रहे हैं, बेरहमी से एक दूसरे के खिलाफ हो जाते हैं। कलियुग में मानव समाज हिंसक रूप से हिंसक हो जाता है, और पुरुष सैकड़ों लाखों निर्दोष प्राणियों को कसाई करने के लिए बूचड़खाने खोलते हैं। बड़े पैमाने पर युद्ध छेड़ दिए जाते हैं, और लाखों इंसान, यहाँ तक कि महिलाएँ और बच्चे भी, जल्दी से मिटा दिए जाते हैं।

जब तक जीवित प्राणी भगवान के व्यक्तित्व के अधिकार को नहीं पहचानता है, वह माया या भौतिक भ्रम के चंगुल में एक बेबस शिकार बना रहता है। वह माया से खुद को मुक्त करने के लिए विभिन्न समाधान तैयार करता है, लेकिन ये समाधान स्वयं माया की रचनाएँ हैं और इस तरह बद्ध आत्मा को मुक्त नहीं कर सकते। वास्तव में, वे केवल उसकी पीड़ा को तीव्र करते हैं। अगले श्लोक में, भगवान कृष्ण विशेष रूप से उद्धव को कलियुग से बचने और वापस घर, वापस भगवान के पास जाने की चेतावनी देते हैं। हम में से जिन्होंने पहले ही कलियुग में जन्म ले लिया है, उन्हें भी इस सलाह पर ध्यान देना चाहिए और पूर्ण ज्ञान के आनंदमय जीवन के लिए तुरंत भगवान के शाश्वत निवास पर वापस जाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने चाहिए। भौतिक दुनिया कभी भी एक सुखद जगह नहीं होती है, खासकर कलियुग के भयावह दिनों के दौरान।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)