श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  11.7.39 
प्राणवृत्त्यैव सन्तुष्येन्मुनिर्नैवेन्द्रियप्रियै: ।
ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाङ्‍मन: ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
विद्वान मुनि को चाहिए कि वह अपने सादे जीवन-यापन में ही संतुष्टि माने। उसे भौतिक इन्द्रियों के सुखों में संतुष्टि नहीं खोजनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को अपने शरीर की देखभाल इस तरह से करनी चाहिए कि उसका उच्च ज्ञान नष्ट न हो और उसकी वाणी तथा मन आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से भटक न जाएँ।
 
विद्वान मुनि को चाहिए कि वह अपने सादे जीवन-यापन में ही संतुष्टि माने। उसे भौतिक इन्द्रियों के सुखों में संतुष्टि नहीं खोजनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को अपने शरीर की देखभाल इस तरह से करनी चाहिए कि उसका उच्च ज्ञान नष्ट न हो और उसकी वाणी तथा मन आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से भटक न जाएँ।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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