श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  11.7.39 
प्राणवृत्त्यैव सन्तुष्येन्मुनिर्नैवेन्द्रियप्रियै: ।
ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाङ्‍मन: ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
विद्वान मुनि को चाहिए कि वह अपने सादे जीवन-यापन में ही संतुष्टि माने। उसे भौतिक इन्द्रियों के सुखों में संतुष्टि नहीं खोजनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को अपने शरीर की देखभाल इस तरह से करनी चाहिए कि उसका उच्च ज्ञान नष्ट न हो और उसकी वाणी तथा मन आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से भटक न जाएँ।
 
The learned sage should find satisfaction in his simple lifestyle. He should not seek satisfaction by satisfying the physical senses. In other words, a man should take care of his body in such a way that his higher knowledge is not destroyed and his speech and mind are not distracted from the path of self-realization.
तात्पर्य
बुद्धिमान व्यक्ति भौतिक इंद्रिय तृप्ति के रूपों, स्वादों, सुगंधों और संवेदनाओं में अपनी चेतना को समाहित नहीं करता है, बल्कि शरीर और आत्मा को एक साथ रखने के लिए खाने-पीने जैसी गतिविधियों को स्वीकार करता है। व्यक्ति को खाने, सोने, स्नान इत्यादि नियमित गतिविधियों द्वारा अपने शरीर का उचित रखरखाव करना चाहिए, अन्यथा मन कमजोर हो जाएगा, और उसका आध्यात्मिक ज्ञान फीका पड़ जाएगा। यदि कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा तपस्या करता है, या निःस्वार्थता के नाम पर अशुद्ध भोजन स्वीकार करता है, तो वह निश्चित रूप से मन पर नियंत्रण खो देता है। दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक चिकना या भरपूर भोजन करता है तो नींद और वीर्य में अनचाही वृद्धि होगी, और इस प्रकार मन और वाणी पर राजस और तामस गुणों का प्रभुत्व हो जाएगा। भगवान कृष्ण ने भगवद्-गीता में अपने कथन द्वारा पूरे मामले को संक्षेप में बताया है, युक्ताहार-विहारस्य युक्त-चेष्टस्य कर्मसु। व्यक्ति को अपनी सभी शारीरिक गतिविधियों को संयमित और समझदारी से नियंत्रित करना चाहिए ताकि वे आत्म-साक्षात्कार के लिए अनुकूल हों। यह तकनीक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु द्वारा सिखाई जाती है। यदि कोई व्यक्ति बहुत अधिक तपस्वी है या यदि वह इंद्रिय तृप्ति में बहुत अधिक संलग्न है, तो आत्म-साक्षात्कार असंभव है। प्रभु के एक भक्त का कर्तव्य है कि वह कृष्ण से अलग किसी भी वस्तु को न देखे, क्योंकि वह भ्रम है। एक सज्जन कभी भी दूसरे सज्जन की संपत्ति का आनंद लेने का प्रयास नहीं करेगा। इसी तरह, यदि कोई व्यक्ति कृष्ण के संबंध में सब कुछ देखता है, तो भौतिक इंद्रिय तृप्ति की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन अगर कोई भौतिक वस्तुओं को कृष्ण से अलग देखता है, तो उसकी भौतिक भोग की प्रवृत्ति तुरंत जागृत हो जाती है। एक मनुष्य को प्रेयस, या अस्थायी संतुष्टि, और श्रेयस, स्थायी लाभ के बीच अंतर करने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान होना चाहिए। व्यक्ति कृष्ण की सेवा करने के लिए मजबूत हो ताकि वह एक विनियमित, सीमित रूप में इंद्रिय गतिविधि को स्वीकार कर सकता है, लेकिन अगर कोई भौतिक इंद्रियों को अत्यधिक लिप्त करता है, तो वह आध्यात्मिक जीवन में अपना गुरुत्वाकर्षण और गंभीरता खो देगा और एक साधारण भौतिकवादी की तरह काम करेगा। जैसा कि यहां बताया गया है, अंतिम लक्ष्य ज्ञान है, या परम सत्य की स्थिर चेतना, भगवान कृष्ण।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)