श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  11.7.38 
शश्वत्परार्थसर्वेह: परार्थैकान्तसम्भव: ।
साधु: शिक्षेत भूभृत्तो नगशिष्य: परात्मताम् ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
संत पुरुष को पहाड़ से यह सीखना चाहिए कि अपने सारे समय और शक्ति का इस्तेमाल दूसरों की मदद और सेवा में लगाना चाहिए और दूसरों के कल्याण को ही अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाना चाहिए। उसी तरह, पेड़ से उसे यह सीखना चाहिए कि दूसरों के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी समर्पित कर देनी चाहिए।
 
The saint should learn from the mountain that he should put all his efforts in the service of others and make the welfare of others the sole aim of his life. Similarly, by becoming the disciple of the tree, he should learn to dedicate himself to others.
तात्पर्य
ऊँचे और बड़े पहाड़ बहुत अधिक मिट्टी अपने में धारण करते हैं, और वही मिट्टी असंख्य रूपों में जीवन को आश्रय देती है, जैसे-पेड़, घास, पक्षी, जानवर आदि। पहाड़ों से भी बहुत अधिक जल निर्मल झरने और नदियों के रूप में निकलता है, और यही जल सभी को जीवन देता है। पहाड़ों के उदाहरण का अध्ययन करके, सबको जीवित प्राणियों को सुख प्रदान करने की कला सीखनी चाहिए। हम सभी पवित्र वृक्षों से भी उत्कृष्ट शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं, जो हमें अनगिनत लाभ प्रदान करते हैं, जैसे-फल, फूल, ठंडी छांव और औषधीय अर्क। यहाँ तक कि जब एक पेड़ को अचानक काटकर खींच लिया जाता है, तो भी वह विरोध नहीं करता है बल्कि जलावन के रूप में दूसरों की सेवा करना जारी रखता है। इस प्रकार, हमें ऐसे उदार वृक्षों के शिष्य बनना चाहिए और उनसे सात्विक आचरण के गुण सीखने चाहिए। श्रील माधवाचार्य के अनुसार, परार्थैकान्ता-सम्भवः शब्द इंगित करता है कि व्यक्ति को अपनी सारी संपत्ति और अन्य संपत्तियों को दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित करना चाहिए। अपने अर्जित ऐश्वर्य से, व्यक्ति को विशेष रूप से आध्यात्मिक गुरु और परम भगवान को प्रसन्न करने की कोशिश करनी चाहिए। इस प्रकार, देवता, साथ ही सभी सम्मानित और श्रेष्ठ व्यक्तित्व स्वतः ही प्रसन्न होंगे। जैसा इस श्लोक में वर्णित है, सात्विक आचरण का विकास करके, व्यक्ति सहिष्णु बन जाएगा, और यह उसे भौतिक इंद्रियों की निरर्थक हलचल से मुक्त कर देगा, जो व्यक्ति को भौतिक सुख की तलाश में दुनिया भर में घूमने के लिए प्रेरित करती है। भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी पेड़ के सहिष्णुता के गुणों पर जोर दिया है: तरोर इव सहिशुणा, कीर्तनीयः सदा हरिः। जो व्यक्ति पेड़ की तरह सहिष्णु होता है, वह कृष्ण के पवित्र नाम का लगातार जाप कर सकता है, और निरंतर नई संतुष्टि पाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)