श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 7: भगवान् कृष्ण द्वारा उद्धव को उपदेश  »  श्लोक 33-35
 
 
श्लोक  11.7.33-35 
पृथिवी वायुराकाशमापोऽग्निश्चन्द्रमा रवि: ।
कपोतोऽजगर: सिन्धु: पतङ्गो मधुकृद् गज: ॥ ३३ ॥
मधुहाहरिणो मीन: पिङ्गला कुररोऽर्भक: ।
कुमारी शरकृत् सर्प ऊर्णनाभि: सुपेशकृत् ॥ ३४ ॥
एते मे गुरवो राजन् चतुर्विंशतिराश्रिता: ।
शिक्षा वृत्तिभिरेतेषामन्वशिक्षमिहात्मन: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन्, मैंने चौबीस गुरु बनाए हैं। वो कौन हैं? पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चाँद, सूरज, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, हाथी, मधु-चोर, हिरण, मछली, पिंगला वेश्या, कुररी पक्षी, बालक, नवयुवती, बाण बनाने वाला, साँप, मकड़ी और ततैया। हे राजन्, इनके कार्यों का अध्ययन करके ही मैंने आत्म-ज्ञान सीखा है।
 
O King, I have taken refuge in twenty-four Gurus. These are- Earth, Wind, Sky, Water, Fire, Moon, Sun, Pigeon, Python, Ocean, Moth, Bee, Elephant, Honey-thief, Deer, Fish, Pingla prostitute, Kurri bird, Child, Young woman, Arrow maker, Snake, Spider and Wasp. O King, it is by studying their activities that I have learnt Self-knowledge.
तात्पर्य
तिरछा नाम सुपेसा-कृत इसलिए पड़ा है क्योंकि जो कीट वह मारता है उसे वह अगले जन्म में सुंदर रूप प्राप्त करवाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)